श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1938, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘शत्रुदमन वीर! तुम सो रहे थे। तुम्हारे द्वारा शत्रुओंका नाश करानेके लिये ही मैंने तुम्हें जगाया है। राक्षसोंकी युद्धयात्राके लिये यह सबसे उत्तम समय है॥ १२ ॥
‘तुम पाशधारी यमराजकी भाँति शूल लेकर जाओ और सूर्यके समान तेजस्वी उन दोनों राजकुमारों तथा वानरोंको मारकर खा जाओ॥ १३ ॥
‘वानर तुम्हारा रूप देखते ही भाग जायँगे तथा राम और लक्ष्मणके हृदय भी विदीर्ण हो जायँगे’॥ १४ ॥
महाबली कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर महातेजस्वी राक्षसराज रावणने अपना पुनः नया जन्म हुआ-सा माना॥
राजा रावण कुम्भकर्णके बलको अच्छी तरह जानता था, उसके पराक्रमसे भी पूर्ण परिचित था; इसलिये वह निर्मल चन्द्रमाके समान परम आह्लादसे भर गया॥ १६ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर महाबली कुम्भकर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। वह राजा रावणकी बात सुनकर उस समय युद्धके लिये उद्यत हो गया और लङ्कापुरीसे बाहर निकला॥ १७ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले उस वीरने बड़े वेगसे तीखा शूल हाथमें लिया, जो सब-का-सब काले लोहेका बना हुआ, चमकीला और तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित था॥ १८ ॥
उसकी कान्ति इन्द्रके अशनिके समान थी। वह वज्रके समान भारी था तथा देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और नागोंका संहार करनेवाला था॥ १९ ॥
उसमें लाल फूलोंकी बहुत बड़ी माला लटक रही थी और उससे आगकी चिनगारियाँ झड़ रही थीं। शत्रुओंके रक्तसे रँगे हुए उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महातेजस्वी कुम्भकर्ण रावणसे बोला—‘मैं अकेला ही युद्धके लिये जाऊँगा। अपनी यह सारी सेना यहीं रहे॥ २०-२१ ॥
‘आज मैं भूखा हूँ और मेरा क्रोध भी बढ़ा हुआ है। इसलिये समस्त वानरोंको भक्षण कर जाऊँगा।’ कुम्भकर्णकी यह बात सुनकर रावण बोला— ॥ २२ ॥
‘कुम्भकर्ण! तुम हाथोंमें शूल और मुद्गर धारण करनेवाले सैनिकोंसे घिरे रहकर युद्धके लिये यात्रा करो, क्योंकि महामनस्वी वानर बड़े वीर और अत्यन्त उद्योगी हैं। वे तुम्हें अकेला या असावधान देख दाँतोंसे काट-काटकर नष्ट कर डालेंगे; इसलिये सेनासे घिरकर सब ओरसे