श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1948, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय वह महान् युद्धस्थल, जिसमें शैल-शिखरके वेगसे कितने ही घोड़े और सारथि कुचल गये थे, राक्षसोंके रुधिरसे गीला हो गया॥ १२ ॥
तब भयानक सिंहनाद करनेवाले राक्षस-सेनाके रथियोंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर बाणोंसे गर्जते हुए वानरयूथपतियोंके मस्तकोंको सहसा काटना आरम्भ किया॥ १३ ॥
महामनस्वी वानर भी बड़े-बड़े वृक्ष उखाड़कर शत्रुसेनाके रथ, घोड़े, हाथी, ऊँट और राक्षसोंका संहार करने लगे॥ १४ ॥
हनुमान्जी आकाशमें पहुँचकर कुम्भकर्णके मस्तकपर पर्वत-शिखरों, शिलाओं और नाना प्रकारके वृक्षोंकी वर्षा करने लगे॥ १५ ॥
परंतु महाबली कुम्भकर्णने अपने शूलसे उन पर्वतशिखरोंको फोड़ डाला और बरसाये जानेवाले वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ १६ ॥
तत्पश्चात् उसने अपने तीक्ष्ण शूलको हाथमें लेकर वानरोंकी उस भयंकर सेनापर आक्रमण किया। यह देख हनुमान्जी एक पर्वत-शिखर हाथमें लेकर उस आक्रमणकारी राक्षसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये॥ १७ ॥
उन्होंने कुपित हो श्रेष्ठ पर्वतके समान भयानक शरीरवाले कुम्भकर्णपर बड़े वेगसे प्रहार किया। उनकी उस मारसे कुम्भकर्ण व्याकुल हो उठा। उसका सारा शरीर चर्बीसे गीला हो गया और वह रक्तसे नहा गया॥
फिर तो उसने भी बिजलीके समान चमकते हुए शूलको घुमाकर जिसके शिखरपर आग जल रही हो, उस पर्वतके समान हनुमान्जीकी छातीमें उसी तरह मारा, जैसे स्वामी कार्तिकेयने अपनी भयानक शक्तिसे क्रौञ्चपर्वतपर आघात किया था॥ १९ ॥
उस महासमरमें शूलकी चोटसे हनुमान्जीकी दोनों भुजाओंके बीचका भाग (वक्षःस्थल) विदीर्ण हो गया। वे व्याकुल हो गये और मुँहसे रक्त वमन करने लगे। उस समय पीड़ाके मारे उन्होंने बड़ा भयंकर आर्तनाद किया, जो प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था॥ २० ॥
हनुमान्जीको आघातसे पीड़ित देख राक्षसोंके हर्षकी सीमा न रही। वे सहसा जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे। इधर कुम्भकर्णके भयसे पीड़ित एवं व्यथित हुए वानर युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे॥ २१ ॥