श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1966, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘इस समय मैं अवश्य ही नहींके बराबर हूँ; क्योंकि मेरी दाहिनी बाँह कुम्भकर्ण धराशायी हो गया। जिसका भरोसा करके मैं देवता और असुर किसीसे नहीं डरता था॥ १२ ॥
‘देवताओं और दानवोंका दर्प चूर करनेवाला ऐसा वीर, जो कालाग्निके समान प्रतीत होता था, आज रणक्षेत्रमें रामके हाथसे कैसे मारा गया?॥ १३ ॥
‘भाई! तुम्हें तो वज्रका प्रहार भी कभी कष्ट नहीं पहुँचा सकता था। वही तुम आज रामके बाणोंसे पीड़ित हो भूतलपर कैसे सो रहे हो?॥ १४ ॥
‘आज समराङ्गणमें तुम्हें मारा गया देख आकाशमें खड़े हुए ये ऋषियोंसहित देवता हर्षनाद कर रहे हैं॥
‘निश्चय ही अब अवसर पाकर हर्षसे भरे हुए वानर आज ही लङ्काके समस्त दुर्गम द्वारोंपर चढ़ जायँगे॥ १६ ॥
‘अब मुझे राज्यसे कोई प्रयोजन नहीं है। सीताको लेकर भी मैं क्या करूँगा? कुम्भकर्णके बिना जीनेका मेरा मन नहीं है॥ १७ ॥
‘यदि मैं युद्धस्थलमें अपने भाईका वध करनेवाले रामको नहीं मार सकता तो मेरा मर जाना ही अच्छा है। इस निरर्थक जीवनको सुरक्षित रखना कदापि अच्छा नहीं है॥ १८ ॥
‘मैं आज ही उस देशको जाऊँगा, जहाँ मेरा छोटा भाई कुम्भकर्ण गया है। मैं अपने भाइयोंको छोड़कर क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता॥ १९ ॥
‘मैंने पहले देवताओंका अपकार किया था। अब वे मुझे देखकर हँसेंगे। हा कुम्भकर्ण! तुम्हारे मारे जानेपर अब मैं इन्द्रको कैसे जीत सकूँगा?॥ २० ॥
‘मैंने महात्मा विभीषणकी कही हुई जिन उत्तम बातोंको अज्ञानवश स्वीकार नहीं किया था, वे मेरे ऊपर आज प्रत्यक्षरूपसे घटित हो रही हैं॥ २१ ॥
‘जबसे कुम्भकर्ण और प्रहस्तका यह दारुण विनाश उत्पन्न हुआ है, तभीसे विभीषणकी बात याद आकर मुझे लज्जित कर रही है॥ २२ ॥
‘मैंने धर्मपरायण श्रीमान् विभीषणको जो घरसे निकाल दिया था, उसी कर्मका यह शोकदायक परिणाम अब मुझे भोगना पड़ रहा है’॥ २३ ॥
इस प्रकार भाँति-भाँतिसे दीनतापूर्वक अत्यन्त विलाप करके व्याकुलचित्त हुआ दशमुख रावण अपने छोटे भाई इन्द्र-शत्रु कुम्भकर्णके वधका स्मरण करके बहुत ही व्यथित हो पुनः