श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1971, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनके द्वारा धारण की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी श्वेत पंक्ति आकाशमें शरद्ऋतुके बादलोंकी भाँति उज्ज्वल कान्तिसे युक्त हंसोंकी श्रेणीके समान शोभा पा रही थी॥ ३५ १/२ ॥
आज या तो हम शत्रुओंको परास्त कर देंगे, या स्वयं ही मृत्युकी गोदमें सदाके लिये सो जायँगे—ऐसा निश्चय करके वे वीर राक्षस युद्धके लिये आगे बढ़े॥
वे युद्धदुर्मद महामनस्वी निशाचर गर्जते, सिंहनाद करते, बाण हाथमें लेते और उन्हें शत्रुओंपर छोड़ देते थे॥ ३७ १/२ ॥
उन राक्षसोंके गर्जने, ताल ठोंकने और सिंहनाद करनेसे पृथ्वी कम्पित-सी होने लगी और आकाश फटने-सा लगा॥ ३८ १/२ ॥
उन महाबली राक्षसशिरोमणि वीरोंने प्रसन्नतापूर्वक नगरकी सीमासे बाहर निकलकर देखा, वानरोंकी सेना पर्वत-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष उठाये युद्धके लिये तैयार खड़ी है॥ ३९ १/२ ॥
महामना वानरोंने भी राक्षससेनापर दृष्टिपात किया। वह हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी थी, सैकड़ों-हजारों घुंघुरुओंकी रुनझुनसे निनादित थी, काले मेघोंकी घटा-जैसी दिखायी देती थी और हाथोंमें बड़े-बड़े आयुध लिये हुए थी॥ ४०-४१ ॥
प्रज्वलित अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी राक्षसोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था। निशाचरोंकी उस सेनाको आती देख वानर प्रहार करनेका अवसर पाकर महान् पर्वतशिखर उठाये बारंबार गर्जना करने लगे। वे राक्षसोंका सिंहनाद सहन न करनेके कारण बदलेमें जोर-जोरसे दहाड़ने लगे थे॥ ४२-४३ ॥
वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया हुआ गर्जन-तर्जन सुनकर भयंकर एवं महान् बलसे सम्पन्न राक्षसगण शत्रुओंका हर्ष सहन न कर सके; अतः स्वयं भी अत्यन्त भीषण सिंहनाद करने लगे॥ ४४ ॥
तब वानर-यूथपति राक्षसोंकी उस भयंकर सेनामें घुस गये और शैलशृङ्ग उठाये शिखरोंवाले पर्वतोंकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ४५ ॥
वृक्षों और शिलाओंको आयुधके रूपमें धारण किये वानर योद्धा राक्षससैनिकोंपर अत्यन्त कुपित हो आकाशमें उड़-उड़कर विचरने लगे। कितने ही वानरशिरोमणि वीर मोटी-मोटी शाखाओंवाले वृक्षोंको हाथमें लेकर पृथ्वीपर विचरण करने लगे॥ ४६ १/२ ॥