भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1983

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इकहत्तरवाँ सर्ग

अतिकायका भयंकर युद्ध और लक्ष्मणके द्वारा उसका वध

अतिकायने देखा, शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाली मेरी भयंकर सेना व्यथित हो उठी है, इन्द्रके तुल्य पराक्रमी मेरे भाइयोंका संहार हो गया है तथा मेरे चाचा—दोनों भाई युद्धोन्मत्त (महोदर) और मत्त (महापार्श्व) भी समराङ्गणमें मार गिराये गये हैं, तब उस महातेजस्वी निशाचरको बड़ा क्रोध हुआ। उसे ब्रह्माजीसे वरदान प्राप्त हो चुका था। अतिकाय पर्वतके समान विशालकाय तथा देवता और दानवोंके दर्पका दलन करनेवाला था॥ १—३ ॥

वह इन्द्रका शत्रु था। उसने सहस्रों सूर्योंके समूहकी भाँति देदीप्यमान तेजस्वी रथपर आरूढ़ होकर वानरोंपर धावा किया॥ ४ ॥

उसके मस्तकपर किरीट और कानोंमें शुद्ध सुवर्णके बने हुए कुण्डल झलमला रहे थे। उसने धनुषकी टङ्कार करके अपना नाम सुनाया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ५ ॥

उस सिंहनादसे, अपने नामकी घोषणासे और प्रत्यञ्चाकी भयानक टङ्कारसे उसने वानरोंको भयभीत कर दिया॥ ६ ॥

उसके शरीरकी विशालता देखकर वे वानर ऐसा मानने लगे कि यह कुम्भकर्ण ही फिर उठकर खड़ा हो गया। यह सोचकर सब वानर भयसे पीड़ित हो एक-दूसरेका सहारा लेने लगे॥ ७ ॥

त्रिविक्रम-अवतारके समय बढ़े हुए भगवान् विष्णुके विराट् रूपकी भाँति उसका शरीर देखकर वे वानर-सैनिक भयके मारे इधर-उधर भागने लगे॥ ८ ॥

अतिकायके निकट जाते ही वानरोंके चित्तपर मोह छा गया। वे युद्धस्थलमें लक्ष्मणके बड़े भाई शरणागतवत्सल भगवान् श्रीरामकी शरणमें गये॥ ९ ॥

रथपर बैठे हुए पर्वताकार अतिकायको श्रीरामचन्द्रजीने भी देखा। वह हाथमें धनुष लिये कुछ दूरपर प्रलयकालके मेघकी भाँति गर्जना कर रहा था॥ १० ॥

उस महाकाय निशाचरको देखकर श्रीरामचन्द्रजीको भी बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने वानरोंको सान्त्वना देकर विभीषणसे पूछा—॥ ११ ॥