श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1997, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोर्इ हाथीपर बैठकर चले तो कोर्इ उत्तम घोड़ोंपर। इनके सिवा बाघ, बिच्छू, बिलाव, गदहे, ऊँट, सर्प, सूअर, अन्य हिंसक जन्तु, सिंह, पर्वताकार गीदड़, कौआ, हंस और मोर आदिकी सवारियोंपर चढ़े हुए भयानक पराक्रमी राक्षस वहाँ युद्धके लिये आये॥
उन सबने प्रास, पट्टिश, खड्ग, फरसे, गदा, भुशुण्डि, मुद्गर, डंडे, शतघ्नी और परिघ आदि आयुध धारण कर रखे थे॥ १३ ॥
शङ्खोंकी ध्वनिके साथ मिली हुर्इ भेरियोंकी भयानक आवाज सब ओर गूँज उठी। उस तुमुलनादके साथ इन्द्रद्रोही पराक्रमी इन्द्रजितने बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर प्रस्थान किया॥ १४ ॥
जैसे पूर्ण चन्द्रमासे उपलक्षित आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार ऊपर तने हुए शङ्ख और शशिके समान वर्णवाले श्वेत छत्रसे वह शत्रुसूदन इन्द्रजित् सुशोभित हो रहा था॥ १५ ॥
सोनेके आभूषणोंसे विभूषित और समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ उस वीर निशाचरको दोनों ओरसे सुवर्णनिर्मित उत्तम एवं मनोहर चँवर डुलाये जा रहे थे॥ १६ ॥
विशाल सेनासे घिरे हुए अपने पुत्र इन्द्रजित्को प्रस्थान करते देख राक्षसोंके राजा श्रीमान् रावणने उससे कहा— ॥ १७ ॥
‘बेटा! कोर्इ भी ऐसा प्रतिद्वन्द्वी रथी नहीं है, जो तुम्हारा सामना कर सके। तुमने देवराज इन्द्रको भी पराजित किया है। फिर आसानीसे जीत लेने योग्य एक मनुष्यको परास्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है? तुम अवश्य ही रघुवंशी रामका वध करोगे’॥ १८ ॥
राक्षसराजके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने उसके उस महान् आशीर्वादको सिर झुकाकर ग्रहण किया। फिर तो जैसे अनुपम तेजस्वी सूर्यसे आकाशकी शोभा होती है, उसी प्रकार अप्रतिम शक्तिशाली और सूर्यतुल्य तेजस्वी इन्द्रजित्से लङ्कापुरी सुशोभित होने लगी॥ १९ १/२ ॥
महातेजस्वी शत्रुदमन इन्द्रजित्ने रणभूमिमें पहुँचकर अपने रथके चारों ओर राक्षसोंको खड़ा कर दिया॥ २० १/२ ॥
फिर बीचमें रथसे उतरकर पृथ्वीपर अग्निकी स्थापना करके अग्नितुल्य तेजस्वी उस राक्षसशिरोमणि वीरने चन्दन, फूल तथा लावा आदिके द्वारा अग्निदेवका पूजन किया। उसके बाद उस प्रतापी राक्षसराजने विधिपूर्वक श्रेष्ठ मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उस अग्निमें हविष्यकी आहुति दी॥ २१-२२ १/२ ॥