श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2008, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस श्रेष्ठ पर्वतकी अद्भुत शोभा हो रही थी। हनुमान्जी उस पर्वतपर पहुँच गये॥ ५७ ॥
उस महापर्वतराजका सबसे ऊँचा शिखर सुवर्णमय दिखायी देता था। वहाँ पहुँचकर हनुमान्जीने परम पवित्र बड़े-बड़े आश्रम देखे, जिनमें देवर्षियोंका श्रेष्ठ समुदाय निवास करता था॥ ५८ ॥
उस पर्वतपर जिन्हें हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माका स्थान, उन्हींके दूसरे स्वरूप रजतनाभिका स्थान, इन्द्रका भवन, जहाँ खड़े होकर रुद्रदेवने त्रिपुरासुरपर बाण छोड़ा था, वह स्थान, भगवान् हयग्रीवका वासस्थान तथा ब्रह्मास्त्र देवताका दीप्तिमान् स्थान—ये सभी दिव्य स्थान दिखायी दिये। साथ ही यमराजके सेवक भी वहाँ दृष्टिगोचर हुए॥ ५९ ॥
इसके सिवा अग्नि, कुबेर और द्वादश सूर्योंके समावेशका भी सूर्यतुल्य तेजस्वी स्थान उन्हें दृष्टिगोचर हुआ। चतुर्मुख ब्रह्मा, शंकरजीके धनुष और वसुन्धराकी नाभिके स्थानोंका भी उन्होंने दर्शन किया॥ ६० ॥
तत्पश्चात् श्रेष्ठ कैलासपर्वत, हिमालय-शिला, शिवजीके वाहन वृषभ तथा सुवर्णमय श्रेष्ठ पर्वत ऋषभको भी देखा। इसके बाद उनकी दृष्टि सम्पूर्ण ओषधियोंके उत्तम पर्वतपर पड़ी, जो सब प्रकारकी दीप्तिमती ओषधियोंसे देदीप्यमान हो रहा था॥ ६१ ॥
अग्निराशिके समान प्रकाशित होनेवाले उस पर्वतको देखकर पवनकुमार हनुमान्जीको बड़ा विस्मय हुआ। वे कूदकर ओषधियोंसे भरे हुए उस गिरिराजपर चढ़ गये और वहाँ पूर्वोक्त चारों ओषधियोंकी खोज करने लगे॥
महाकपि पवनपुत्र हनुमान्जी सहस्रों योजन लाँघकर वहाँ आये थे और दिव्य ओषधियोंको धारण करनेवाले उस शैल-शिखरपर विचरण कर रहे थे॥ ६३ ॥
उस उत्तम पर्वतपर रहनेवाले सम्पूर्ण महौषधियाँ यह जानकर कि कोऽइ हमें लेनेके लिये आ रहा है, तत्काल अदृश्य हो गयीं॥ ६४ ॥
उन ओषधियोंको न देखकर महात्मा हनुमान्जी कुपित हो उठे और रोषके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे। ओषधियोंका छिपाना उनके लिये असह्य
हो गया। उनकी आँखें अग्निके समान लाल हो गयीं और वे उस पर्वतराजसे इस प्रकार बोले—॥ ६५ ॥