श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2030, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंमकराक्षका यह वचन सुनकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न वे समस्त बलवान् निशाचर युद्धके लिये सावधान हो गये॥ १३ ॥
वे सब-के-सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और क्रूर स्वभावके थे। उनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और आँखें भूरी थीं। उनके केश सब ओर बिखरे हुए थे; इसलिये वे बड़े भयानक जान पड़ते थे। हाथीके समान चिग्घाड़ते हुए वे विशालकाय निशाचर खरके पुत्र महाकाय मकराक्षको चारों ओरसे घेरकर पृथ्वीको कँपाते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धभूमिकी ओर चले॥ १४-१५ ॥
उस समय चारों ओर सहस्रों शङ्खोंकी ध्वनि हो रही थी। हजारों डंके पीटे जाते थे। योद्धाओंके गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज भी उनके साथ मिली हुई थी। इस प्रकार वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया था॥
उस समय मकराक्षके सारथिके हाथसे चाबुक छूटकर नीचे गिर पड़ा और दैववश उस राक्षसका ध्वज भी सहसा धराशायी हो गया॥ १७ ॥
उसके रथमें जुते हुए घोड़े विक्रमरहित हो गये— वे अपनी नाना प्रकारकी विचित्र चालें भूल गये। पहले तो कुछ दूरतक आकुल—लड़खड़ाते हुए पैरोंसे गये; फिर ठीकसे चलने लगे। परंतु भीतरसे वे बहुत दुःखी थे। उनके मुखपर आँसूकी धारा बह रही थी॥ १८ ॥
दुष्ट बुद्धिवाले उस भयंकर राक्षस मकराक्षकी यात्राके समय धूलसे भरी हुई दारुण एवं प्रचण्ड वायु चलने लगी थी॥ १९ ॥
उन सब अपशकुनोंको देखकर भी वे महाबलशाली राक्षस उनकी कोई परवा न करके सब-के-सब उस स्थानपर गये, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे॥
उन राक्षसोंकी अङ्गकान्ति मेघ, हाथी और भैंसोंके समान काली थी। वे युद्धके मुहानेपर अनेक बार गदाओं और तलवारोंकी चोटसे घायल हो चुके थे। उनमें युद्धविषयक कौशल विद्यमान था। वे निशाचर ‘पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा’ ऐसा बारंबार कहते हुए वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८ ॥