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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2047, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 2047

वे कमल और उत्पलकी सुगन्धसे युक्त जल ले आकर उनके ऊपर छिड़कने लगे। उस समय वे सहसा प्रज्वलित होकर दहन-कर्म करनेवाली और बुझायी न जा सकनेवाली अग्निके समान दिखायी देते थे॥ १२ ॥

भाईकी यह अवस्था देखकर लक्ष्मणको बड़ा दुःख हुआ। वे उन्हें दोनों भुजाओंमें भरकर बैठ गये और अस्वस्थ हुए श्रीरामसे यह युक्तियुक्त एवं प्रयोजनभरी बात बोले— ॥ १३ ॥

‘आर्य! आप सदा शुभ मार्गपर स्थिर रहनेवाले और जितेन्द्रिय हैं, तथापि धर्म आपको अनर्थोंसे बचा नहीं पाता है। इसलिये वह निरर्थक ही जान पड़ता है॥ १४ ॥

‘स्थावरों तथा पशु आदि जङ्गम प्राणियोंको भी सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; किंतु उनके सुखमें धर्म कारण नहीं है (क्योंकि न तो उनमें धर्माचरणकी शक्ति है और न धर्ममें उनका अधिकार ही है)। अतः धर्म सुखका साधन नहीं है; ऐसा मेरा विचार है॥ १५ ॥

‘जैसे स्थावर भूत धर्माधिकारी न होनेपर भी सुखी देखा जाता है, उसी प्रकार जङ्गम प्राणी (पशु आदि) भी सुखी है, यह बात स्पष्ट ही समझमें आती है। यदि कहें, जहाँ धर्म है, वहाँ सुख अवश्य है तो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उस दशामें आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषको विपत्तिमें नहीं पड़ना चाहिये॥ १६ ॥

‘यदि अधर्मकी भी सत्ता होती अर्थात् अधर्म अवश्य ही दुःखका साधन होता तो रावणको नरकमें पड़े रहना चाहिये था और आप-जैसे धर्मात्मा पुरुषपर संकट नहीं आना चाहिये था॥ १७ ॥

‘रावणपर तो कोई संकट नहीं है और आप संकटमें पड़ गये हैं; अतः धर्म और अधर्म दोनों परस्परविरोधी हो गये हैं—धर्मात्माको दुःख और पापात्माको सुख मिलने लगा है॥ १८ ॥

‘यदि धर्मसे धर्मका फल (सुख) और अधर्मसे अधर्मका फल (दुःख) ही मिलनेका नियम होता तो जिन रावण आदिमें अधर्म ही प्रतिष्ठित है, वे अधर्मके फलभूत दुःखसे ही युक्त होते और जो लोग अधर्ममें रुचि नहीं रखते हैं, वे धर्मसे—धर्मके फलभूत सुखसे कभी वञ्चित न होते। धर्ममार्गसे चलनेवाले इन धर्मात्मा पुरुषोंको केवल धर्मका फल—सुख ही प्राप्त होता॥ १९-२० ॥

‘किंतु जिनमें अधर्म प्रतिष्ठित है, उनके तो धन बढ़ रहे हैं और जो स्वभावसे ही धर्माचरण करनेवाले हैं, वे क्लेशमें पड़े हुए हैं। इसलिये ये धर्म और अधर्म—दोनों निरर्थक हैं॥ २१ ॥

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