भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2052

‘मैंने उसका हित करनेकी इच्छासे अनेक बार यह अनुरोध किया कि विदेहकुमारीको छोड़ दो; किंतु उसने मेरी बात नहीं मानी॥ ११ ॥

‘सीताको दूसरा कोई पुरुष साम, दाम और भेदनीतिके द्वारा भी नहीं देख सकता; फिर युद्धके द्वारा कैसे देख सकता है?॥ १२ ॥

‘महाबाहो! राक्षस इन्द्रजित् वानरोंको मोहमें डालकर चला गया है। जिसका उसने वध किया था, वह मायामयी जानकी थीं, ऐसा निश्चित समझिये॥ १३ ॥

‘वह इस समय निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर होम करेगा और जब होम करके लौटेगा, उस समय उस रावणकुमारको संग्राममें परास्त करना इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी कठिन होगा॥ १४ १/२ ॥

‘निश्चय ही उसने हमलोगोंको मोहमें डालनेके लिये ही यह मायाका प्रयोग किया है। उसने सोचा होगा— यदि वानरोंका पराक्रम चलता रहा तो मेरे इस कार्यमें विघ्न पड़ेगा (इसीलिये उसने ऐसा किया है)॥ १५ १/२ ॥

‘जबतक उसका होमकर्म समाप्त नहीं होता, उसके पहले ही हमलोग सेनासहित निकुम्भिला-मन्दिरमें चले चलें। नरश्रेष्ठ! झूठे ही प्राप्त हुए इस संतापको त्याग दीजिये॥ १६ १/२ ॥

‘प्रभो! आपको शोकसे संतप्त होते देख सारी सेना दुःखमें पड़ी हुई है। आप तो धैर्यमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं; अतः स्वस्थचित्त होकर यहीं रहिये और सेनाको लेकर जाते हुए हमलोगोंके साथ लक्ष्मणजीको भेज दीजिये॥

‘ये नरश्रेष्ठ लक्ष्मण अपने पैने बाणोंसे मारकर रावणकुमारको वह होमकर्म त्याग देनेके लिये विवश कर देंगे। इससे वह मारा जा सकेगा॥ १९ ॥

‘लक्ष्मणके ये पैने बाण जो पक्षियोंके अङ्गभूत परोंसे युक्त होनेके कारण बड़े वेगशाली हैं, कंक आदि क्रूर पक्षियोंके समान इन्द्रजित्के रक्तका पान करेंगे॥ २० ॥

‘अतः महाबाहो! जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंके वधके लिये वज्रका प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार आप उस राक्षसके विनाशके लिये शुभलक्षण-सम्पन्न लक्ष्मणको जानेकी आज्ञा दीजिये॥ २१ ॥