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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2066, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 2066

‘लक्ष्मण! आज मेरे द्वारा मारे जाकर जब तुम्हारे प्राण निकल जायँगे, तब तुम्हारी लाशपर झुंड-के-झुंड गीदड़, बाज और गीध टूट पड़ेंगे॥ २३ ॥

‘परम दुर्बुद्धि राम तुम-जैसे अनार्य, क्षत्रियाधम एवं अपने भक्त भाईको आज ही मेरे द्वारा मारा गया देखेंगे॥

‘सुमित्राकुमार! तुम्हारा कवच खिसककर पृथ्वीपर गिर जायगा, धनुष भी दूर जा पड़ेगा और तुम्हारा मस्तक भी धड़से अलग कर दिया जायगा। इस अवस्थामें राम आज मेरे हाथसे मारे गये तुमको देखेंगे’॥ २५ ॥

इस तरह कठोर बातें कहते हुए रावणकुमार इन्द्रजित्से अपने प्रयोजनको जाननेवाले लक्ष्मणने कुपित होकर यह युक्तियुक्त उत्तर दिया—॥ २६ ॥

‘क्रूरकर्म करनेवाले दुर्बुद्धि राक्षस! बकवासका बल छोड़ दे। तू ये सब बातें कहता क्यों है? करके दिखा॥

‘निशाचर! जो काम अभी किया नहीं, उसके लिये यहाँ व्यर्थ डींग क्यों हाँकता है ? तू जिसे कहता है, उस कार्यको पूरा कर, जिससे मुझे तेरी इस बढ़ाचढ़ाकर कही हुई बातपर विश्वास हो॥ २८ ॥

‘नरभक्षी राक्षस! तू देख लेना, मैं कोई कठोर बात न कहकर तेरे ऊपर किसी तरहका आक्षेप न करके आत्मप्रशंसा किये बिना ही तेरा वध करूँगा’॥

ऐसा कहकर लक्ष्मणने उस राक्षसकी छातीमें बड़े वेगसे पाँच नाराच मारे, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे॥ ३० ॥

सुन्दर पंखोंके कारण अत्यन्त वेगसे जानेवाले और प्रज्वलित सर्पके समान दिखायी देनेवाले वे बाण उस राक्षसकी छातीपर सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित हो रहे थे॥ ३१ ॥

लक्ष्मणके बाणोंसे आहत होकर रावणकुमार रोषसे आगबबूला हो उठा। उसने अच्छी तरह चलाये हुए तीन बाणोंसे लक्ष्मणको भी घायल करके बदला चुकाया॥ ३२ ॥

एक ओर पुरुषसिंह लक्ष्मण थे तो दूसरी ओर राक्षससिंह इन्द्रजित्। दोनों युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर विजय पाना चाहते थे। उन दोनोंका वह तुमुल संग्राम महाभयंकर था॥ ३३ ॥

वे दोनों वीर पराक्रमी, बलसम्पन्न, विक्रमशाली, परम दुर्जय तथा अनुपम बल और तेजसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दुर्जय थे॥ ३४ ॥

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