श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2071, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवासीवाँ सर्ग
विभीषणका राक्षसोंपर प्रहार, उनका वानर-यूथपतियोंको प्रोत्साहन देना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजित्के सारथिका और वानरोंद्वारा उसके घोड़ोंका वध
लक्ष्मण और इन्द्रजित्को दो मदमत्त हाथियोंकी भाँति परस्पर विजय पानेकी इच्छासे युद्धासक्त होकर जूझते देख उन दोनोंके युद्धको देखनेकी इच्छासे रावणके बलवान् भाई शूरवीर विभीषण सुन्दर धनुष धारण किये उस युद्धके मुहानेपर आकर खड़े हो गये॥ १-२ ॥
वहाँ खड़े होकर उन्होंने अपने विशाल धनुषको खींचा और राक्षसोंपर तेज धारवाले बड़े-बड़े बाणोंको बरसाना आरम्भ किया॥ ३ ॥
जैसे वज्र नामक अस्त्र बड़े-बड़े पर्वतोंको विदीर्ण कर देते हैं, उसी प्रकार विभीषणके चलाये हुए वे बाण, जिनका स्पर्श आगके समान जलानेवाला था, राक्षसोंपर गिरकर उनके अङ्गोंको चीरने लगे॥ ४ ॥
विभीषणके अनुचर भी राक्षसोंमें श्रेष्ठ वीर थे; अतः वे भी समराङ्गणमें शूल, खड्ग और पट्टिशोंद्वारा वीर राक्षसोंका संहार करने लगे॥ ५ ॥
उन चारों राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण धृष्ट गजशावकोंके बीचमें खड़े हुए गजराजकी भाँति शोभा पाते थे॥ ६ ॥
राक्षसोंमें श्रेष्ठ विभीषण समयोचित कर्तव्यको जानते थे, इसलिये उन्होंने वानरोंको, जिन्हें राक्षसोंका वध करना प्रिय था, युद्धके लिये प्रेरित करते हुए यह समयके अनुरूप बात कही—॥ ७ ॥
‘वानरेश्वरो! अब खड़े-खड़े क्या देखते हो? राक्षसराज रावणका यह एकमात्र सहारा है, जो तुम्हारे सामने खड़ा है। रावणकी सेनाका इतना ही भाग अब शेष रह गया है॥ ८ ॥
‘इस युद्धके मुहानेपर इस पापी राक्षस इन्द्रजित्के मारे जानेपर रावणको छोड़कर उसकी सारी सेनाको मरी हुई ही समझो॥ ९ ॥
‘वीर प्रहस्त मारा गया, महाबली निकुम्भ, कुम्भकर्ण, कुम्भ तथा निशाचर धूम्राक्ष भी कालके गालमें चले गये॥