श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2073, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंवानरों और राक्षसोंका वह महायुद्ध क्रोधसे भरे हुए देवताओं और असुरोंके संग्रामकी भाँति बड़ा भयंकर हो चला। उसमें बड़े जोर-जोरसे भयानक कोलाहल होने लगा॥ २४ ॥
उस समय महामनस्वी हनुमान्जीने लक्ष्मणको अपनी पीठसे उतार दिया और स्वयं भी अत्यन्त कुपित हो पर्वत-शिखरसे एक सालवृक्ष उखाड़कर सहस्रों राक्षसोंका संहार करने लगे। शत्रुओंके लिये उन्हें परास्त करना बहुत ही कठिन था॥ २५ १/२ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले बलवान् इन्द्रजित्ने अपने चाचाको भी घोर युद्धका अवसर देकर पुनः लक्ष्मणपर धावा किया॥ २६ १/२ ॥
लक्ष्मण और इन्द्रजित् दोनों वीर उस समय रणभूमिमें बड़े वेगसे जूझने लगे। वे दोनों बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे॥ २७ १/२ ॥
वे महाबली वीर बाणोंका जाल-सा बिछाकर बारंबार एक-दूसरेको ढक देते थे। ठीक उसी तरह, जैसे वर्षाकालमें वेगशाली चन्द्रमा और सूर्य बादलोंसे आच्छादित हो जाया करते हैं॥ २८ १/२ ॥
युद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंके हाथोंमें इतनी फुर्ती थी कि तरकससे बाणोंका निकालना, उनको धनुषपर रखना, धनुषको इस हाथसे उस हाथमें लेना, उसे मुट्ठीमें दृढ़तापूर्वक पकड़ना, कानतक खींचना, बाणोंका विभाग करना, उन्हें छोड़ना और लक्ष्य वेधना आदि कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था॥ २९-३० १/२ ॥
धनुषके वेगसे छोड़े गये बाणसमूहोंद्वारा आकाश सब ओरसे ढक गया। अतः उसमें साकार वस्तुओंका दीखना बंद हो गया॥ ३१ १/२ ॥
लक्ष्मण रावणकुमारके पास पहुँचकर और रावणकुमार लक्ष्मणके निकट जाकर दोनों परस्पर जूझने लगे। इस प्रकार युद्ध करते हुए जब वे एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते, तब भयंकर अव्यवस्था पैदा हो जाती थी। क्षण-क्षणमें यह निश्चय करना कठिन हो जाता था कि अमुककी विजय या पराजय होगी॥ ३२ १/२ ॥
उन दोनोंके द्वारा वेगपूर्वक छोड़े गये तीखे बाणोंसे आकाश ठसाठस भर गया और वहाँ अँधेरा छा गया॥
वहाँ गिरते हुए बहुसंख्यक अस्त्रों और सैकड़ों तीखे सायकोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ भी व्याप्त हो गयीं॥ ३४ १/२ ॥