श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् प्रमाथी, रभस, शरभ और गन्धमादन— इन चार वानरेश्वरोंने अमर्षसे भरकर अपना महान् वेग प्रकट किया॥ ४८ ॥
वे चारों वानर महान् बलशाली और भयंकर पराक्रमी थे। वे सहसा उछलकर इन्द्रजित्के चारों घोड़ोंपर कूद पड़े॥ ४९ ॥
उन पर्वताकार वानरोंके भारसे दब जानेके कारण उन घोड़ोंके मुखोंसे खून निकलने लगा॥ ५० ॥
उनसे रौंदे जानेके कारण घोड़ोंके अङ्ग-भङ्ग हो गये और वे प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार घोड़ोंकी जान ले इन्द्रजित्के विशाल रथको भी तोड़-फोड़कर वे चारों वानर पुनः वेगसे उछले और लक्ष्मणके पास आकर खड़े हो गये॥ ५१ ॥
सारथि तो पहले ही मारा गया था। जब घोड़े भी मार डाले गये, तब रावणकुमार रथसे कूद पड़ा और बाणोंकी वर्षा करता हुआ सुमित्राकुमारकी ओर बढ़ा॥
उस समय इन्द्रके समान पराक्रमी लक्ष्मणने श्रेष्ठ घोड़ोंके मारे जानेसे पैदल चलकर युद्धमें तीखे उत्तम बाणोंकी वर्षा करते हुए इन्द्रजित्को अपने बाणसमूहोंकी मारसे अत्यन्त घायल कर दिया॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९ ॥