श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेवता आदि वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। वह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ। उस क्रूरकर्मा राक्षसके मारे जानेपर वहाँकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी॥ ८६ ॥
सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर जल स्वच्छ हो गया, आकाश भी निर्मल दिखायी देने लगा और देवता तथा दानव हर्षसे खिल उठे। देवता, गन्धर्व और दानव वहाँ आये और सब एक साथ संतुष्ट होकर बोले—अब ब्राह्मणलोग निश्चिन्त एवं क्लेशशून्य होकर सर्वत्र विचरें॥ ८७-८८ ॥
समराङ्गणमें अप्रतिम बलशाली निशाचरशिरोमणि इन्द्रजित्को मारा गया देख हर्षसे भरे हुए वानर-यूथपति लक्ष्मणका अभिनन्दन करने लगे॥ ८९ ॥
विभीषण, हनुमान् और रीछ-यूथपति जाम्बवान्— ये इस विजयके लिये लक्ष्मणजीका अभिनन्दन करते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ९० ॥
हर्ष एवं रक्षाका अवसर पाकर वानर किलकिलाते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ रघुकुलनन्दन लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये॥ ९१ ॥
उस समय अपनी पूँछोंको हिलाते और फटकारते हुए वानर वीर ‘लक्ष्मणकी जय हो’ यह नारा लगाने लगे॥ ९२ ॥
वानरोंका चित्त हर्षसे भरा हुआ था। वे विविध गुणोंवाले वानर एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे॥ ९३ ॥
युद्धस्थलमें लक्ष्मणके प्रिय सुहृद् वानर उनका वह दुष्कर एवं महान् पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए। देवता भी उस इन्द्रद्रोही राक्षसका वध हुआ देख मनमें बड़े भारी हर्षका अनुभव करने लगे॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
९० ॥
* पहले लक्ष्मणके कवचके टूटनेका वर्णन आ चुका है। उसके बाद लक्ष्मणने फिर अभेद्य कवच धारण किया था। यह इस प्रसंगसे जाना जाता है।