श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हुए स्नेही बन्धु लक्ष्मणको गोदमें बिठाकर और हृदयसे लगाकर वे बड़े प्यारसे उनकी ओर बारम्बार देखने लगे॥ ९-१० ॥
लक्ष्मण अपने शरीरमें धँसे हुए बाणोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित थे। उनके अङ्गोंमें जगह-जगह घाव हो गया था। वे बारम्बार लम्बी साँस खींचते थे, आघातजनित क्लेशसे संतप्त हो रहे थे तथा उन्हें साँस लेनेमें भी पीड़ा होती थी। उस अवस्थामें पुरुषोत्तम श्रीरामने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर पीड़ा दूर करनेके लिये पुनः जल्दी-जल्दी उनके शरीरपर हाथ फेरा और आश्वासन देकर लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ ११-१२ ॥
‘वीर! तुमने अपने दुष्कर पराक्रमसे परम कल्याणकारी कार्य सम्पन्न किया है। आज बेटेके मारे जानेपर युद्धस्थलमें रावणको भी मैं मारा गया ही मानता हूँ। उस दुरात्मा शत्रुओका वध हो जानेसे आज मैं वास्तवमें विजयी हो गया। सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें इन्द्रजित्का वध करके निर्दयी निशाचर रावणकी दाहिनी बाँह ही काट डाली; क्योंकि वही उसका सबसे बड़ा सहारा था॥ १३-१४ १/२ ॥
‘विभीषण और हनुमान्ने भी समरभूमिमें महान् पराक्रम कर दिखाया है। तुम सब लोगोंने मिलकर तीन दिन और तीन रातमें किसी तरह उस वीर राक्षसको मार गिराया तथा मुझे शत्रुहीन बना दिया। अब रावण ही युद्धके लिये निकलेगा॥ १५-१६ ॥
‘महान् सैन्य-समुदायसहित पुत्रको मारा गया सुनकर रावण विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आयेगा॥
‘पुत्रके वधसे संतप्त होकर निकले हुए उस दुर्जय राक्षसराज रावणको मैं अपनी बड़ी भारी सेनाके द्वारा घेरकर मार डालूँगा॥ १८ ॥
‘लक्ष्मण! इन्द्रजित् इन्द्रको भी जीत चुका था। जब उसे भी तुमने युद्धभूमिमें मार गिराया; तब तुम-जैसे रक्षक और सहायकके होते हुए मुझे सीता और भूमण्डलके राज्यको प्राप्त करनेमें कोऽइ कठिनाऽइ नहीं होगी’॥ १९ ॥
इस प्रकार भाऽइको आश्वासन देकर रघुकुलनन्दन श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेणको बुलाकर कहा— ॥ २० ॥
‘परम बुद्धिमान् सुषेण! तुम शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे ये मित्रवत्सल सुमित्राकुमार पूर्णतः स्वस्थ हो जायँ और इनके शरीरसे बाण निकलकर घाव भरनेके साथ ही सारी पीड़ा दूर हो जाय॥ २१ ॥