श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘ये राम हैं, जो हाथियोंकी सेनाको मार रहे हैं, ये रहे राम, जो बड़े-बड़े रथियोंका संहार कर रहे हैं, नहीं-नहीं ये हैं राम, जो अपने पैने बाणोंसे घोड़ोंसहित पैदल सैनिकोंका वध कर रहे हैं;’ इस प्रकार वे सब राक्षस श्रीरघुनाथजीकी किंचित् समानताके कारण सभीको राम समझ लेते और रामके ही भ्रमसे क्रोधमें भरकर आपसमें एक-दूसरेको मारने लगते थे॥ २४-२५ ॥
श्रीरामचन्द्रजी राक्षससेनाको दग्ध कर रहे थे तो भी वे राक्षस उन्हें देख नहीं सके। महात्मा श्रीरामने राक्षसोंको गान्धर्व नामक दिव्य अस्त्रसे मोहित कर दिया था॥ २६ ॥
अतः वे राक्षस रणभूमिमें कभी तो हजारों राम देखते थे और कभी उन्हें उस महासमरमें एक ही रामका दर्शन होता था॥ २७ ॥
वे महात्मा श्रीरामके धनुषकी सुनहरी कोटि (नोक या कोणभाग)-को अलातचक्रकी भाँति घूमती देखते थे; किंतु साक्षात् श्रीरघुनाथजीको नहीं देख पाते थे॥ २८ ॥
युद्धस्थलमें राक्षसोंका संहार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् चक्रके समान जान पड़ते थे। शरीरका मध्यभाग अर्थात् नाभि ही उस चक्रकी नाभि थी, बल ही उससे प्रकट होनेवाली ज्वाला था, बाण ही उसके अरे थे, धनुष ही नेमिका स्थान ग्रहण किये हुए था, धनुषकी टंकार और तलध्वनि—ये ही दोनों उस चक्रकी घर्घराहट थीं, तेज-बुद्धि और कान्ति आदि गुण ही उस चक्रकी प्रभा थे तथा दिव्यास्त्रोंके गुणप्रभाव ही उसके प्रान्तभाग अर्थात् धार थे। जैसे प्रजा प्रलयकालमें कालचक्रका दर्शन करती है, उसी प्रकार राक्षस उस समय श्रीरामरूपी चक्रको देख रहे थे॥ २९-३० ॥
श्रीरामने अकेले दिनके आठवें भाग (डेढ़ घंटे)-में ही आगकी ज्वालाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंके वायुके समान वेगशाली दस हजार रथोंकी, अठारह हजार वेगवान् हाथियोंकी, चौदह हजार सवारोंसहित घोड़ोंकी तथा पूरे दो लाख पैदल निशाचरोंकी सेनाका संहार कर डाला॥ ३१—३३ ॥
जब घोड़े और रथ नष्ट हो गये तथा ध्वज तोड़-फोड़ डाले गये, तब मरनेसे बचे हुए निशाचर शान्त हो लङ्कापुरीमें भाग गये॥ ३४ ॥
मारे गये हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंकी लाशोंसे भरी हुई वह रणभूमि कुपित हुए महात्मा रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि-सी प्रतीत होती थी॥ ३५ ॥
तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियोंने साधुवाद देकर भगवान् श्रीरामके इस कार्यकी प्रशंसा की॥ ३६ ॥