श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2112, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसे उठाकर उन्होंने राक्षसपर दे मारा। साथ ही उस राक्षसने भी इनके ऊपर गदा फेंकी। गदा और मूसल दोनों आपसमें टकराकर टूट गये और जमीनपर जा गिरे॥ २४ ॥
वे दोनों वीर तेज और बलसे सम्पन्न थे और जलती हुई अग्नियोंके समान उद्दीप्त हो रहे थे। अपने-अपने आयुधोंके टूट जानेपर वे घूंसोंसे एक-दूसरेको मारने लगे॥ २५ ॥
उस समय बारम्बार गर्जते हुए वे दोनों योद्धा परस्पर मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। फिर थप्पड़ोंसे एक-दूसरेको मारकर दोनों ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६ ॥
फिर तत्काल ही दोनों उछले और शीघ्र ही एक-दूसरेपर चोट करने लगे। वे दोनों वीर हार नहीं मानते थे। दोनों ही दोनोंपर भुजाओंद्धारा प्रहार करते रहे॥ २७ ॥
शत्रुओंको तपानेवाले वे दोनों वीर बाहुयुद्ध करते-करते थक गये। तब महान् वेगशाली राक्षस महोदरने थोड़ी ही दूरपर पड़ी हुई ढालसहित तलवार उठा ली। उसी तरह अत्यन्त वेगशाली कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने भी वहाँ गिरे हुए विशाल खड्गको ढालसहित उठा लिया॥ २८ ॥
महोदर और सुग्रीव दोनों युद्धके मैदानमें शस्त्र चलानेकी कलामें चतुर थे तथा दोनोंके शरीर रोषसे प्रभावित थे; अतः रणभूमिमें हर्ष और उत्साहसे युक्त हो वे तलवार उठाये गर्जते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े॥
वे दोनों बड़ी तेजीसे दायें-बायें पैंतरे बदल रहे थे, दोनोंका दोनोंपर क्रोध बढ़ा हुआ था तथा दोनों ही अपनी-अपनी विजयकी आशा लगाये हुए थे॥ ३१ ॥
अपने बलपर घमंड करनेवाले महान् वेगशाली तथा शौर्य-सम्पन्न दुर्बुद्धि महोदरने अपनी वह तलवार सुग्रीवके विशाल कवचपर दे मारी॥ ३२ ॥
सुग्रीवके कवचमें लगी हुई तलवारको जब वह राक्षस खींचने लगा, उसी समय कपिकुञ्जर सुग्रीवने महोदरके शिरस्त्राणसहित कुण्डलमण्डित मस्तकको अपने खड्गसे काट लिया॥ ३३ ॥
मस्तक कट जानेपर राक्षसराज महोदर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर उसकी सेना फिर वहाँ नहीं दिखायी दी॥ ३४ ॥
महोदरको मारकर प्रसन्न हुए वानरराज सुग्रीव अन्य वानरोंके साथ गर्जना करने लगे। उस समय दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ और श्रीरघुनाथजी हर्षसे खिल उठे॥ ३५ ॥