श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘अब इस युद्धसे अथवा प्राणोंकी रक्षासे मुझे क्या प्रयोजन है? अब लड़ने-भिड़नेकी कोई आवश्यकता नहीं है। जब संग्रामके मुहानेपर मारे जाकर लक्ष्मण ही सदाके लिये सो गये, तब युद्ध जीतनेसे क्या लाभ है?॥
‘वनमें आते समय जैसे महातेजस्वी लक्ष्मण मेरे पीछे-पीछे चले आये थे, उसी तरह यमलोकमें जाते समय मैं भी इनके पीछे-पीछे जाऊँगा॥ १३ ॥
‘हाय! जो सदा मुझमें अनुराग रखनेवाले मेरे प्रिय बन्धुजन थे, छलसे युद्ध करनेवाले निशाचरोंने आज उनकी यह दशा कर दी॥ १४ ॥
‘प्रत्येक देशमें स्त्रियाँ मिल सकती हैं, देश-देशमें जाति-भाई उपलब्ध हो सकते हैं; परंतु ऐसा कोई देश मुझे नहीं दिखायी देता, जहाँ सहोदर भाई मिल सके॥
‘दुर्धर्ष वीर लक्ष्मणके बिना मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? पुत्रवत्सला माता सुमित्रासे किस तरह बात कर सकूँगा?॥ १६ ॥
‘माता सुमित्राके दिये हुए उलाहनेको कैसे सह सकूँगा? माता कौसल्या और कैकेयीको क्या जवाब दूँगा?॥
‘भरत और महाबली शत्रुघ्न जब पूछेंगे कि आप लक्ष्मणके साथ वनमें गये थे, फिर उनके बिना ही कैसे लौट आये तो उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा?॥ १८ ॥
‘अतः मेरे लिये यहीं मर जाना अच्छा है। भाई-बन्धुओंमें जाकर उनकी कही हुई खोटी-खरी बातें सुनना अच्छा नहीं। मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा अपराध किया था, जिसके कारण मेरे सामने खड़ा हुआ मेरा धर्मात्मा भाई मारा गया॥ १९ १/२ ॥
‘हा भाई नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! हा प्रभावशाली शूरप्रवर! तुम मुझे छोड़कर अकेले क्यों परलोकमें जा रहे हो?॥ २० १/२ ॥
‘भैया! मैं तुम्हारे बिना रो रहा हूँ। तुम मुझसे बोलते क्यों नहीं हो? प्रिय बन्धु! उठो। आँख खोलकर देखो। क्यों सो रहे हो? मैं बहुत दुःखी हूँ। मुझपर दृष्टिपात करो॥ २१ १/२ ॥
‘महाबाहो! पर्वतों और वनोंमें जब मैं शोकसे पीड़ित हो प्रमत्त एवं विषादग्रस्त हो जाता था, तब तुम्हीं मुझे धैर्य बँधाते थे (फिर इस समय मुझे क्यों नहीं सान्त्वना देते हो?)’॥ २२ १/२ ॥