श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2134, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंगयी है, जिसमें सूर्यतुल्य तेजस्वी, हरे रंगवाले, सुवर्णजालसे विभूषित तथा सोनेके साज-बाजसे सजे हुए अच्छे घोड़े जुते हैं और उन घोड़ोंको श्वेत चँवर आदिसे अलंकृत किया गया है तथा जिसके ध्वजका दण्ड सोनेका बना हुआ है, उस रथपर आरूढ़ हो मातलि देवराजका संदेश ले स्वर्गसे भूतलपर उतरकर श्रीरामचन्द्रजीके सामने खड़ा हुआ॥ १०—१२ ॥
सहस्रलोचन इन्द्रका सारथि मातलि चाबुक लिये रथपर बैठा हुआ हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे बोला— 'महाबली शत्रुसूदन श्रीमान् रघुवीर! सहस्र नेत्रधारी देवराज इन्द्रने विजयके लिये आपको यह रथ समर्पित किया है॥ १४ ॥
'यह इन्द्रका विशाल धनुष है। यह अग्निके समान तेजस्वी कवच है। ये सूर्यसदृश प्रकाशमान बाण हैं तथा यह कल्याणमयी निर्मल शक्ति है॥ १५ ॥
'वीरवर महाराज! आप इस रथपर आरूढ़ हो मुझ सारथिकी सहायतासे राक्षसराज रावणका उसी तरह वध कीजिये, जैसे महेन्द्र दानवोंका संहार करते हैं'॥ १६ ॥
मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उस रथकी परिक्रमा की और उसे प्रणाम करके वे उसपर सवार हुए। उस समय अपनी शोभासे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करने लगे॥ १७ ॥
तत्पश्चात् महाबाहु श्रीराम और राक्षस रावणमें द्वैरथ युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो बड़ा ही अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ १८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता थे। उन्होंने राक्षसराजके चलाये हुए गान्धर्व-अस्त्रको गान्धर्व-अस्त्रसे और दैव-अस्त्रको दैव-अस्त्रसे नष्ट कर दिया॥
तब राक्षसोंके राजा निशाचर रावणने अत्यन्त कुपित हो पुनः परम भयानक राक्षसास्त्रका प्रयोग किया॥ २० ॥
फिर तो रावणके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण महाविषैले सर्प हो-होकर श्रीरामचन्द्रजीके निकट पहुँचने लगे॥ २१ ॥
उन सर्पोंके मुख आगके समान प्रज्वलित होते थे। वे अपने मुखोंसे जलती आग उगल रहे थे और मुँह फैलाये होनेके कारण बड़े भयंकर दिखायी देते थे। वे सब-के-सब श्रीरामके ही सामने आने लगे॥ २२ ॥
उनका स्पर्श वासुकि नागके समान असह्य था। उनके फन प्रज्वलित हो रहे थे और वे महान् विषसे भरे थे। उन सर्पाकार बाणोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण दिशाएँ और विदिशाएँ