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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2137

इसी समय दुष्टात्मा रावणने क्रोधमें आकर श्रीरामचन्द्रजीपर प्रहार करनेकी इच्छासे एक बहुत बड़ा हथियार उठाया॥ ४७ ॥

वह वज्रके समान शक्तिशाली, महान् शब्द करनेवाला तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहारक था। उसकी शिखाएँ शैल-शिखरोंके समान थीं। वह मन और नेत्रोंको भी भयभीत करनेवाला था। उसके अग्रभाग बहुत तीखे थे। वह प्रलयकालकी धूमयुक्त अग्निराशिके समान अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसे पाना या नष्ट करना कालके लिये भी कठिन एवं असम्भव था॥ ४८-४९ ॥

उसका नाम था शूल। वह समस्त भूतोंको छिन्नभिन्न करके उन्हें भयभीत करनेवाला था। रोषसे उद्दीप्त हुए रावणने उस शूलको हाथमें ले लिया॥ ५० ॥

समरभूमिमें अनेक सेनाओंमें विभक्त शूरवीर राक्षसोंसे घिरे हुए उस पराक्रमी निशाचरने बड़े क्रोधके साथ उस शूलको ग्रहण किया था॥ ५१ ॥

उसे ऊपर उठाकर उस विशालकाय राक्षसने युद्धस्थलमें बड़ी भयानक गर्जना की। उस समय उसके नेत्र रोषसे लाल हो रहे थे और वह अपनी सेनाका हर्ष बढ़ा रहा था॥ ५२ ॥

राक्षसराज रावणके उस भयंकर सिंहनादने उस समय पृथ्वी, आकाश, दिशाओं और विदिशाओंको भी कम्पित कर दिया॥ ५३ ॥

उस महाकाय दुरात्मा निशाचरके भैरवनादसे सम्पूर्ण प्राणी थर्रा उठे और सागर भी विक्षुब्ध हो उठा॥ ५४ ॥

उस विशाल शूलको हाथमें लेकर महापराक्रमी रावणने बड़े जोरसे गर्जना करके श्रीरामसे कठोर वाणीमें कहा—॥ ५५ ॥

‘राम! यह शूल वज्रके समान शक्तिशाली है। इसे मैंने रोषपूर्वक अपने हाथमें लिया है। यह भाऽईसहित तुम्हारे प्राणोंको तत्काल हर लेगा॥ ५६ ॥

‘युद्धकी इच्छा रखनेवाले राघव! आज तुम्हारा वध करके सेनाके मुहानेपर जो शूरवीर राक्षस मारे गये हैं, उन्हींके समान अवस्थामें तुम्हें भी पहुँचा दूँगा॥ ५७ ॥

‘रघुकुलके राजकुमार! ठहरो, अभी इस शूलके द्वारा तुम्हें मौतके घाट उतारता हूँ।’ ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने श्रीरघुनाथजीके ऊपर उस शूलको चला दिया॥