भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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एक सौ चारवाँ सर्ग

रावणका सारथिको फटकारना और सारथिका अपने उत्तरसे रावणको संतुष्ट करके उसके रथको रणभूमिमें पहुँचाना

रावण कालकी शक्तिसे प्रेरित हो रहा था, अतः मोहवश अत्यन्त कुपित हो क्रोधसे लाल आँखें करके अपने सारथिसे बोला— ॥ १ ॥

‘दुर्बुद्धे! क्या तूने मुझे पराक्रमशून्य, असमर्थ, पुरुषार्थशून्य, डरपोक, ओछा, धैर्यहीन, निस्तेज, मायारहित और अस्त्रोंके ज्ञानसे वञ्चित समझ रखा है, जो मेरी अवहेलना करके तू अपनी बुद्धिसे मनमाना काम कर रहा है (तूने मुझसे पूछा क्यों नहीं?)॥ २-३ ॥

‘मेरा अभिप्राय क्या है, यह जाने बिना ही मेरी अवहेलना करके तू किसलिये शत्रुके सामनेसे मेरा यह रथ हटा लाया?॥ ४ ॥

‘अनार्य! आज तूने मेरे चिरकालसे उपार्जित यश, पराक्रम, तेज और विश्वासपर पानी फेर दिया॥ ५ ॥

‘मेरे शत्रुका बल-पराक्रम विख्यात है। उसे अपने बल-विक्रमद्वारा संतुष्ट करना मेरे लिये उचित है और मैं युद्धका लोभी हूँ, तो भी तूने रथ हटाकर शत्रुके दृष्टिमें मुझे कायर सिद्ध कर दिया॥ ६ ॥

‘दुर्मते! यदि तू इस रथको मोहवश किसी तरह भी शत्रुके सामने नहीं ले जाता है तो मेरा यह अनुमान सत्य है कि शत्रुने तुझे घूस देकर फोड़ लिया है॥ ७ ॥

‘हित चाहनेवाले मित्रका यह काम नहीं है। तूने जो कार्य किया है, वह शत्रुओंके करने योग्य है॥ ८ ॥

‘यदि तू मेरे साथ बहुत दिनोंसे रहा है और यदि मेरे गुणोंका तुझे स्मरण है तो मेरे इस रथको शीघ्र लौटा ले चल। कहीं ऐसा न हो कि मेरा शत्रु भाग जाय’॥ ९ ॥

यद्यपि सारथिकी बुद्धिमें रावणके लिये हितकी ही भावना थी तथापि उस मूर्खने जब उससे ऐसी कठोर बात कही, तब सारथिने बड़ी विनयके साथ यह हितकर वचन कहा—॥ १० ॥