भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2150, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2150

⬅ विषय-सूची (TOC)

एक सौ छठाँ सर्ग

रावणके रथको देख श्रीरामका मातलिको सावधान करना, रावणकी पराजयके सूचक उत्पातों तथा रामकी विजय सूचित करनेवाले शुभ शकुनोंका वर्णन

रावणके सारथिने हर्ष और उत्साहसे युक्त होकर उसके रथको शीघ्रतापूर्वक हाँका। वह रथ शत्रुसेनाको कुचल डालनेवाला था और गन्धर्वनगरके समान आश्चर्यजनक दिखायी देता था। उसपर बहुत ऊँची पताका फहरा रही थी। उस रथमें उत्तम गुणोंसे सम्पन्न और सोनेके हारोंसे अलंकृत घोड़े जुते हुए थे। रथके भीतर युद्धकी आवश्यक सामग्री भरी पड़ी थी। उस रथने ध्वजा-पताकाओंकी तो माला-सी पहन रखी थी। वह आकाशको अपना ग्रास बनाता हुआ-सा जान पड़ता था। वसुन्धराको अपनी घर्घर-ध्वनिसे निनादित कर रहा था। वह शत्रु की सेनाओंका नाशक और अपनी सेनाके योद्धाओंका हर्ष बढ़ानेवाला था॥ १—३ १/२ ॥

नरराज श्रीरामचन्द्रजीने सहसा वहाँ आते हुए, विशाल ध्वजसे अलंकृत और घोर घर्घर-ध्वनिसे युक्त राक्षसराज रावणके उस रथको देखा॥ ४ १/२ ॥

उसमें काले रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसकी कान्ति बड़ी भयंकर थी। वह आकाशमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानके समान दृष्टिगोचर होता था॥

उसपर फहराती हुईंऽ पताकाएँ विद्युत्के समान जान पड़ती थीं। वहाँ जो रावणका धनुष था, उसके द्वारा वह रथ इन्द्रधनुषकी छटा छिटकाता था और बाणोंकी धारावाहिक वृष्टि करता था। इससे वह जलधारावर्षी मेघके समान प्रतीत होता था॥ ६ १/२ ॥

उसकी आवाज ऐसी मालूम होती थी, मानो वज्रके आघातसे किसी पर्वतके फटनेका शब्द हो रहा हो। मेघके समान प्रतीत होनेवाले शत्रुके उस रथको आता देख श्रीरामचन्द्रजीने बड़े वेगसे अपने धनुषपर टंकार दी। उस समय उनका वह धनुष द्वितीयाके चन्द्रमा-जैसा दिखायी देता था। श्रीरामने इन्द्रसारथि मातलिसे कहा— ॥ ७-८ १/२ ॥

‘मातले! देखो, मेरे शत्रु रावणका रथ बड़े वेगसे आ रहा है। रावण जिस प्रकार प्रदक्षिणभावसे महान् वेगके साथ पुनः आ रहा है, उससे जान पड़ता है, इसने समरभूमिमें अपने वधका निश्चय कर लिया है॥ ९-१० ॥