श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसमयमें ही जपा (अड़हुल)-के फूलकी-सी लाल रंगवाली संध्यासे आवृत हुई लङ्कापुरीकी भूमि दिनमें भी जलती हुई-सी दिखायी देती थी॥ २३ ॥
रावणके सामने वज्रपातकी-सी गड़गड़ाहट और बड़ी भारी आवाजके साथ बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं, जो उसके अहितकी सूचना दे रही थीं। उन उत्पातोंने राक्षसोंको विषादमें डाल दिया॥ २४ ॥
रावण जहाँ-जहाँ जाता, वहाँ-वहाँकी भूमि डोलने लगती थी। प्रहार करते हुए राक्षसोंकी भुजाएँ ऐसी निकम्मी हो गयी थीं, मानो उन्हें किन्हींने पकड़ लिया हो॥ २५ ॥
रावणके आगे पड़ी हुई सूर्यदेवकी किरणें पर्वतीय धातुओंके समान लाल, पीले, सफेद और काले रंगकी दिखायी देती थीं॥ २६ ॥
रावणके रोषावेशसे पूर्ण मुखकी ओर देखती और अपने-अपने मुखोंसे आग उगलती हुई गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलती थीं और उनके पीछे झुंड-के-झुंड गीध मँडराते चलते थे॥ २७ ॥
रणभूमिमें धूल उड़ाती वायु राक्षसराज रावणकी आँखें बंद करती हुई प्रतिकूल दिशाकी ओर बह रही थी॥ २८ ॥
उसकी सेनापर सब ओरसे बिना बादलके ही दुःसह एवं कठोर आवाजके साथ भयानक बिजलियाँ गिरीं॥ २९ ॥
समस्त दिशाएँ और विदिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं। धूलकी बड़ी भारी वर्षाके कारण आकाशका दिखायी देना कठिन हो गया॥ ३० ॥
भयानक आवाज करनेवाली सैकड़ों दारुण सारिकाएँ आपसमें घोर कलह करती हुई रावणके रथपर गिर पड़ती थीं॥ ३१ ॥
उसके घोड़े अपने जघनस्थलसे आगकी चिनगारियाँ और नेत्रोंसे आँसू बरसा रहे थे। इस प्रकार वे एक ही साथ आग और पानी दोनों प्रकट करते थे॥ ३२ ॥
इस तरह बहुत-से दारुण एवं भयंकर उत्पात प्रकट हुए, जो रावणके विनाशकी सूचना दे रहे थे॥ ३३ ॥
श्रीरामके सामने भी अनेक शकुन प्रकट हुए, जो सब प्रकारसे शुभ, मङ्गलमय तथा विजयके सूचक थे॥