भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2163, कुल 2621 में से

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एक सौ नवाँ सर्ग

विभीषणका विलाप और श्रीरामका उन्हें समझाकर रावणके अन्त्येष्टि-संस्कारके लिये आदेश देना

पराजित हुए भाईको मरकर रणभूमिमें पड़ा देख विभीषणका हृदय शोकके वेगसे व्याकुल हो गया और वे विलाप करने लगे—॥ १ ॥

‘हा विख्यात पराक्रमी वीर भाई दशानन! हा कार्यकुशल नीतिज्ञ! तुम तो सदा बहुमूल्य बिछौनोंपर सोया करते थे, आज इस तरह मारे जाकर भूमिपर क्यों पड़े हो?॥

‘हे वीर! तुम्हारी ये बाजूबंदसे विभूषित दोनों विशाल भुजाएँ निश्चेष्ट हो गयी हैं। तुम इन्हें फैलाकर क्यों पड़े हुए हो? तुम्हारे माथेका मुकुट जो सूर्यके समान तेजस्वी है, यहाँ फेंका पड़ा है॥ ३ ॥

‘वीरवर! आज तुम्हारे ऊपर वही संकट आकर पड़ा है, जिसके लिये मैंने तुम्हें पहलेसे ही आगाह कर दिया था; किंतु उस समय काम और मोहके वशीभूत होनेके कारण तुम्हें मेरी बातें नहीं रुची थीं॥ ४ ॥

‘अहङ्कारके कारण न तो प्रहस्तने, न इन्द्रजित्ने, न दूसरे लोगोंने, न अतिरथी कुम्भकर्णने, न अतिकायने, न नरान्तकने और न स्वयं तुमने ही मेरी बातोंको अधिक महत्त्व दिया था, उसीका फल यह सामने आया है॥

‘आज शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ इस वीर रावणके धराशायी होनेसे सुन्दर नीतिपर चलनेवाले लोगोंकी मर्यादा टूट गयी, धर्मका मूर्तिमान् विग्रह चला गया, सत्त्व (बल)-के संग्रहका स्थान नष्ट हो गया, सुन्दर हाथ चलानेवाले वीरोंका सहारा चला गया, सूर्य पृथ्वीपर गिर पड़ा, चन्द्रमा अँधेरेमें डूब गया, प्रज्वलित आग बुझ गयी और सारा उत्साह निरर्थक हो गया॥ ६-७ ॥

‘रणभूमिकी धूलमें राक्षसशिरोमणि रावणके सो जानेसे इस लोकका आधार और बल समाप्त हो गया। अब यहाँ क्या शेष रह गया?॥ ८ ॥

‘हाय! धैर्य ही जिसके पत्ते थे, हठ ही सुन्दर फूल था, तपस्या ही बल और शौर्य ही मूल था, उस राक्षसराज रावणरूपी महान् वृक्षको आज रणभूमिमें श्रीराघवेन्द्ररूपी प्रचण्ड वायुने रौंद डाला!॥ ९ ॥

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