श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2170, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाबली, महापराक्रमी और महातेजस्वी देवशत्रु थे॥ १० १/२ ॥
‘निश्चय ही ये श्रीरामचन्द्रजी महान् योगी एवं सनातन परमात्मा हैं। इनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। ये महान्से भी महान्, अज्ञानान्धकारसे परे तथा सबको धारण करनेवाले परमेश्वर हैं, जो अपने हाथमें शङ्ख, चक्र और गदा धारण करते हैं, जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है, भगवती लक्ष्मी जिनका कभी साथ नहीं छोड़तीं, जिन्हें परास्त करना सर्वथा असम्भव है तथा जो नित्य स्थिर एवं सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं, उन सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने ही समस्त लोकोंका हित करनेकी इच्छासे मनुष्यका रूप धारण करके वानररूपमें प्रकट हुए सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर राक्षसोंसहित आपका वध किया है; क्योंकि आप देवताओंके शत्रु और समस्त संसारके लिये भयंकर थे॥ ११—१४ १/२ ॥
‘नाथ! पहले आपने अपनी इन्द्रियोंको जीतकर ही तीनों लोकोंपर विजय पायी थी, उस वैरको याद रखती हुई-सी इन्द्रियोंने ही अब आपको परास्त किया है॥
‘जब मैंने सुना कि जनस्थानमें बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे होनेपर भी आपके भाई खरको श्रीरामने मार डाला है, तभी मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं॥ १६ १/२ ॥
‘जिस लङ्का नगरीमें देवताओंका भी प्रवेश होना कठिन था, वहीं जब हनुमान्जी बलपूर्वक घुस आये, उसी समय हमलोग भावी अनिष्टकी आशङ्कासे व्यथित हो उठी थीं॥ १७ १/२ ॥
‘मैंने बारम्बार कहा—प्राणनाथ! आप रघुनाथजीसे वैर-विरोध न कीजिये; परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी। उसीका आज यह फल मिला है॥ १८ १/२ ॥
‘राक्षसराज! आपने अपने ऐश्वर्यका, शरीरका तथा स्वजनोंका विनाश करनेके लिये ही अकस्मात् सीताकी कामना की थी॥ १९ १/२ ॥
‘दुर्मते! भगवती सीता अरुन्धती और रोहिणीसे भी बढ़कर पतिव्रता हैं। वे वसुधाकी भी वसुधा और श्रीकी भी श्री हैं। अपने स्वामीके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाली और सबकी पूजनीया उन सीतादेवीका तिरस्कार करके आपने बड़ा अनुचित कार्य किया था॥
‘मेरे प्राणनाथ! सर्वाङ्गसुन्दरी शुभलक्षणा सीता निर्जन वनमें निवास करती थीं। आप छलसे उन्हें दुःखमें डालकर यहाँ हर लाये। यह आपके लिये बड़े कलङ्ककी बात हुई। मिथिलेशकुमारीके साथ समागमके लिये जो आपके मनमें कामना थी, उसे तो आप पा नहीं