श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर ऊँची नासिकासे युक्त था, कान्ति, शोभा और तेजके द्वारा जो क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य और कमलको लज्जित करता था, किरीटोंके समूह जिसे जगमग बनाये रहते थे, जिसके अधर ताँबेके समान लाल थे, जिसमें दीप्तिमान् कुण्डल दमकते रहते थे, पान-भूमिमें जिसके नेत्र नशेसे व्याकुल और चञ्चल देखे जाते थे, जो नाना प्रकारके गजरे धारण करता था, मनोहर और सुन्दर था तथा मुसकराकर मीठी-मीठी बातें किया करता था, वही आपका मुखारविन्द आज शोभा नहीं पा रहा है। प्रभो! वह श्रीरामके सायकोंसे विदीर्ण हो खूनकी धारासे रँग गया है। इसका मेदा और मस्तिष्क छिन्न-भिन्न हो गया है तथा रथकी धूलोंसे इसमें रूक्षता आ गयी है॥ ३४—३७ १/२ ॥
‘हाय! मुझ मन्दभागिनीने कभी जिसके विषयमें सोचातक नहीं था, वही मुझे वैधव्यका दुःख प्रदान करनेवाली अन्तिम अवस्था (मृत्यु) आपको प्राप्त हो गयी॥ ३८ १/२ ॥
‘दानवराज मय मेरे पिता, राक्षसराज रावण मेरे पति और इन्द्रपर भी विजय प्राप्त करनेवाला इन्द्रजित् मेरा पुत्र है—यह सोचकर मैं अत्यन्त गर्वसे भरी रहती थी॥
‘मेरी यह दृढ़ धारणा बनी हुई थी कि मेरे रक्षक ऐसे लोग हैं जो दर्पसे भरे हुए शत्रुओंको मथ डालनेमें समर्थ, क्रूर, विख्यात बल और पौरुषसे सम्पन्न तथा किसीसे भी भयभीत नहीं होनेवाले हैं॥ ४० १/२ ॥
‘राक्षसशिरोमणियो! ऐसे प्रभावशाली तुमलोगोंको यह मनुष्यसे अज्ञात भय किस प्रकार प्राप्त हुआ?॥
‘जो चिकने इन्द्रनील-मणिके समान श्याम, ऊँचे शैल-शिखरके समान विशाल तथा केयूर, अङ्गद, नीलम और मोतियोंके हार एवं फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देता था, विहारस्थलोंमें अधिक कान्तिमान् तथा संग्राम-भूमियोंमें अतिशय दीप्तिमान् प्रतीत होता था और आभूषणोंकी प्रभासे जिसकी विद्युन्मालामण्डित मेघकी-सी शोभा होती थी, वही आपका शरीर आज अनेक तीखे बाणोंसे भरा हुआ है; अतः यद्यपि आजसे फिर इसका स्पर्श मेरे लिये दुर्लभ हो जायगा, तथापि इन बाणोंके कारण मैं इसका आलिङ्गन नहीं कर पाती हूँ॥ ४२—४४ १/२ ॥
‘राजन्! जैसे साहीकी देह काँटोंसे भरी होती है, उसी प्रकार आपके शरीरमें इतने बाण लगे हैं कि कहीं एक अंगुल भी जगह नहीं रह गयी है। वे सभी बाण मर्म-स्थानोंमें धँस गये हैं और उनसे शरीरका स्नायु-बन्धन छिन्न-भिन्न हो गया है। इस अवस्थामें पृथ्वीपर पड़ा हुआ आपका