श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेकर उन महान् शक्तिशाली तथा मनके समान वेगवाले वानरोंको समुद्रका जल ले आनेकी आज्ञा दी॥ ११-१२ १/२ ॥
वे मनके समान वेगशाली श्रेष्ठ वानर तुरंत ही गये और समुद्रसे जल लेकर लौट आये॥ १३ १/२ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने एक घट जल लेकर उसे उत्तम आसनपर स्थापित कर दिया और उस घटके जलसे विभीषणका वेदोक्त विधिके अनुसार लङ्काके राजपदपर अभिषेक किया। यह अभिषेक श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे हुआ था। उस समय राक्षसोंके बीचमें सुहृदोंसे घिरे हुए विभीषण राजसिंहासनपर विराजमान थे। लक्ष्मणके बाद सभी राक्षसों और वानरोंने भी उनका अभिषेक किया॥
वे अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीरामकी ही स्तुति करने लगे। राक्षसराज विभीषणको लङ्काके राज्यपर अभिषिक्त देख उनके मन्त्री और प्रेमी राक्षस बहुत प्रसन्न हुए। साथ ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १७-१८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए उस विशाल राज्यको पाकर विभीषण अपनी प्रजाको सान्त्वना दे श्रीरामचन्द्रजीके पास आये॥ १९ ॥
उस समय हर्षसे भरे हुए नगरनिवासी निशाचर विभीषणको अर्पित करनेके लिये दही, अक्षत, मिठाई, लावा और फूल लाये॥ २० ॥
दुर्धर्ष पराक्रमी विभीषणने वे सब मङ्गलजनक माङ्गलिक वस्तुएँ लेकर श्रीराम और लक्ष्मणको भेंट की॥ २१ ॥
श्रीरघुनाथजीने विभीषणको कृतकार्य एवं सफलमनोरथ देख उनकी प्रसन्नताके लिये ही उन सब माङ्गलिक वस्तुओंको ले लिया॥ २२ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़े हुए पर्वताकार वीर वानर हनुमान्जीसे कहा— ॥ २३ ॥
‘सौम्य! तुम इन महाराज विभीषणकी आज्ञा ले लङ्कानगरीमें प्रवेश करके मिथिलेशकुमारी सीतासे उनका कुशल-समाचार पूछो॥ २४ ॥
‘साथ ही उन विदेहराजकुमारीसे सुग्रीव और लक्ष्मणसहित मेरा कुशल-समाचार निवेदन करो। वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरीश्वर! तुम वैदेहीको यह प्रिय समाचार सुना दो कि रावण युद्धमें मारा