श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसीताकी यह बात सुनकर विभीषण बोले— 'देवि! आपके पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीने जैसी आज्ञा दी है, आपको वैसा ही करना चाहिये'॥ १२ ॥
उनका यह वचन सुनकर पतिभक्तिसे सुरक्षित तथा पतिको ही देवता माननेवाली सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीताने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वामीकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली॥ १३ ॥
तत्पश्चात् विदेहकुमारीने सिरसे स्नान करके सुन्दर शृङ्गार किया तथा बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण पहनकर वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ १४ ॥
तब विभीषण बहुमूल्य वस्त्रोंसे आवृत्त दीप्तिमती सीतादेवीको शिबिकामें बिठाकर भगवान् श्रीरामके पास ले आये। उस समय बहुत-से निशाचर चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा कर रहे थे॥ १५ ॥
भगवान् श्रीराम ध्यानस्थ हैं, यह जानकर भी विभीषण उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोले— ‘प्रभो! सीतादेवी आ गयी हैं’॥ १६ ॥
राक्षसके घरमें बहुत दिनोंतक निवास करनेके बाद आज सीताजी आयी हैं, यह सोच उनके आगमनका समाचार सुनकर शत्रुसूदन श्रीरघुनाथजीको एक ही समय रोष, हर्ष और दुःख प्राप्त हुआ॥ १७ ॥
तदनन्तर ‘सीता सवारीपर आयी हैं’ इस बातपर तर्क-वितर्कपूर्ण विचार करके श्रीरघुनाथजीको प्रसन्नता नहीं हुई। वे विभीषणसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥
‘सदा मेरी विजयके लिये तत्पर रहनेवाले सौम्य राक्षसराज! तुम विदेहकुमारीसे कहो, वे शीघ्र मेरे पास आयें’॥ १९ ॥
श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ विभीषणने तुरंत वहाँसे दूसरे लोगोंको हटाना प्रारम्भ किया॥ २० ॥
पगड़ी बाँधे और अङ्गा पहिने हुए बहुत-से सिपाही हाथोंमें झाँझकी तरह बजती हुई छड़ी लिये उन वानरयोद्धाओंको हटाते हुए चारों ओर घूमने लगे॥ २१ ॥
उनके द्वारा हटाये जाते हुए रीछों, वानरों और राक्षसोंके समुदाय अन्ततोगत्वा दूर जाकर खड़े हो गये॥