भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2230

‘ऊपर बाँह और नीचे मुँह किये चिघाड़ते हुए हाथीके समान जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले उस राक्षसको उन तीनोंने मारकर गड्ढेमें फेंरुंक दिया॥ १३ ॥

‘वह दुष्कर कर्म करके दोनों भांऽइ श्रीराम और लक्ष्मण सायंकालमें शरभङ्ग मुनिके रमणीय आश्रमपर जा पहुँचे॥ १४ ॥

‘शरभंग मुनि श्रीरामके समक्ष स्वर्गलोकको चले गये। तब सत्यपराक्रमी श्रीराम सब मुनियोंको प्रणाम करके जनस्थानमें आये॥ १५ ॥

‘जनस्थानमें आनेके बाद शूर्पणखा नामवाली एक राक्षसी (मनमें कामभाव लेकर) श्रीरामचन्द्रजीके पास आयी। तब श्रीरामने लक्ष्मणको उसे दण्ड देनेका आदेश दिया। महाबली लक्ष्मणने सहसा उठकर तलवार उठायी और उस राक्षसीके नाक-कान काट लिये॥ १६ १/२ ॥

‘वहाँ रहते हुए महात्मा श्रीरघुनाथजीने अकेले ही शूर्पणखाकी प्रेरणासे आये हुए भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया॥ १७ १/२ ॥

‘युद्धके मुहानेपर एकमात्र श्रीरामके साथ भिड़कर वे समस्त राक्षस पहरभरमें ही समाप्त हो गये॥ १८ १/२ ॥

‘तपस्यामें विघ्न डालनेवाले उन दण्डकारण्यनिवासी महाबली और महापराक्रमी राक्षसोंको श्रीरघुनाथजीने युद्धमें मार डाला॥ १९ १/२ ॥

‘उस रणभूमिमें वे चौदह हजार राक्षस पीस डाले गये, खर मारा गया, फिर दूषणका काम तमाम हुआ। तदनन्तर त्रिशिराको भी मौतके घाट उतार दिया गया॥

‘इस घटनासे पीड़ित होकर वह मूर्ख राक्षसी लङ्कामें रावणके पास गयी। रावणके कहनेसे उसके अनुचर मारीच नामक भयंकर राक्षसने रत्नमय मृगका रूप धारण करके विदेहराजकुमारी सीताको लुभाया॥

‘उस मृगको देखकर सीताने श्रीरामसे कहा— ‘आर्यपुत्र! इस मृगको पकड़ लीजिये। इसके रहनेसे मेरा यह आश्रम कान्तिमान् एवं मनोहर हो जायगा’॥ २३ ॥

‘तब श्रीरामने हाथमें धनुष लेकर उस मृगका पीछा किया और झुकी हुंऽइ गाँठवाले एक बाणसे उस भागते हुए मृगको मार डाला॥ २४ ॥

‘सौम्य! जब श्रीरघुनाथजी मृगके पीछे जा रहे थे और लक्ष्मण भी उन्हींका समाचार लेनेके लिये पर्णशालासे बाहर निकल गये, तब रावणने उस आश्रममें प्रवेश किया॥ २५ ॥