श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2243, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा॥ ३४ ॥
उन सबने आगे बढ़कर श्रीरघुनाथजीको बधार्इ दी और श्रीरामने भी बदलेमें उनका अभिनन्दन किया। फिर वे सब पुरवासी भाइयोंसे घिरे हुए महात्मा श्रीरामके पीछे-पीछे चलने लगे॥ ३५ ॥
जैसे नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमा सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार मन्त्रियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाजनोंसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी दिव्यकान्तिसे उद्भासित हो रहे थे॥
सबसे आगे बाजेवाले थे। वे आनन्दमग्न हो तुरही, करताल और स्वस्तिक बजाते तथा माङ्गलिक गीत गाते थे। उन सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी नगरकी ओर बढ़ने लगे॥ ३७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके आगे अक्षत और सुवर्णसे युक्त पात्र, गौ, ब्राह्मण, कन्याएँ तथा हाथमें मिठार्इ लिये अनेकानेक मनुष्य चल रहे थे॥ ३८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अपने मन्त्रियोंसे सुग्रीवकी मित्रता, हनुमान्जीके प्रभाव तथा अन्य वानरोंके अद्भुत पराक्रमकी चर्चा करते जा रहे थे॥ ३९ ॥
वानरोंके पुरुषार्थ और राक्षसोंके बलकी बातें सुनकर अयोध्यावासियोंको बड़ा विस्मय हुआ। श्रीरामने विभीषणके मिलनका प्रसंग भी अपने मन्त्रियोंको बताया॥ ४० ॥
यह सब बताकर वानरोंसहित तेजस्वी श्रीरामने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुर्इ अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया॥
उस समय पुरवासियोंने अपने-अपने घरपर लगी हुर्इ पताकाएँ ऊँची कर दीं। फिर श्रीरामचन्द्रजी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंके उपयोगमें आये हुए पिताके रमणीय भवनमें गये॥ ४२ ॥
उस समय रघुकुलनन्दन राजकुमार श्रीरामने महात्मा पिताजीके भवनमें प्रवेश करके माता कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भरतसे अर्थयुक्त मधुर वाणीमें कहा— ॥ ४३-४४ ॥
‘भरत! मेरा जो अशोकवाटिकासे घिरा हुआ मुक्ता एवं वैदूर्य मणियोंसे जटिल विशाल भवन है, वह सुग्रीवको दे दो’॥ ४५ ॥
उनकी आज्ञा सुनकर सत्यपराक्रमी भरतने सुग्रीवका हाथ पकड़कर उस भवनमें प्रवेश किया॥ ४६ ॥