भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2254

कितने हर्षकी बात है!’॥ ३२ १/२ ॥

उन पवित्रात्मा मुनियोंकी वह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे हाथ जोड़कर पूछने लगे— ॥ ३३ १/२ ॥

‘पूज्यपाद महर्षियो! निशाचर रावण तथा कुम्भकर्ण दोनों ही महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। उन दोनोंको लाँघकर आप रावणपुत्र इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों करते हैं?॥ ३४ १/२ ॥

‘महोदर, प्रहस्त, विरुपाक्ष, मत्त, उन्मत्त तथा दुर्धर्ष वीर देवान्तक और नरान्तक—इन महान् वीरोंका उल्लङ्घन करके आपलोग रावणकुमार इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों कर रहे हैं?॥ ३५-३६ ॥

‘अतिकाय, त्रिशिरा तथा निशाचर धूम्राक्ष—इन महापराक्रमी वीरोंका अतिक्रमण करके आप रावणपुत्र इन्द्रजित्की ही प्रशंसा क्यों करते हैं?॥ ३७ ॥

‘उसका प्रभाव कैसा था? उसमें कौन-सा बल और पराक्रम था? अथवा किस कारणसे यह रावणसे भी बढ़कर सिद्ध होता है॥ ३८ ॥

‘यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, गोपनीय न हो तो मैं इसे सुनना चाहता हूँ। आपलोग बतानेकी कृपा करें। यह मेरा विनम्र अनुरोध है। मैं आपलोगोंको आज्ञा नहीं दे रहा हूँ॥ ३९ ॥

‘उस रावणपुत्रने इन्द्रको भी किस तरह जीत लिया? कैसे वरदान प्राप्त किया? पुत्र किस प्रकार महाबलवान् हो गया और उसका पिता रावण क्यों वैसा बलवान् नहीं हुआ?॥ ४० ॥

‘मुनीश्वर! वह राक्षस इन्द्रजित् महासमरमें किस तरह पितासे भी अधिक शक्तिशाली एवं इन्द्रपर भी विजय पानेवाला हो गया? तथा किस तरह उसने बहुत-से वर प्राप्त कर लिये? इन सब बातोंको मैं जानना चाहता हूँ; इसलिये बारम्बार पूछता हूँ। आज आप ये सारी बातें मुझे बताइये’॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ॥

१ ॥


* वसिष्ठमुनि एक शरीरसे अयोध्यामें रहते हुए भी दूसरे शरीरसे सप्तर्षिमण्डलमें रहते थे। उसी दूसरे शरीरसे उनके आनेकी बात यहाँ कही गयी है—ऐसा समझना चाहिये।