भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2257, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2257

‘राजर्षि तृणबिन्दु अपनी तपस्यासे प्रकाशमान थे। उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो ज्ञात हुआ कि यह सब कुछ महर्षि पुलस्त्यके ही करनेसे हुआ है॥ २३ ॥

‘उन पवित्रात्मा महर्षिके उस शापको जानकर वे अपनी पुत्रीको साथ लिये पुलस्त्यजीके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ २४ ॥

‘भगवन्! मेरी यह कन्या अपने गुणोंसे ही विभूषित है। महर्षे! आप इसे स्वयं प्राप्त हुई भिक्षाके रूपमें ग्रहण कर लें॥ २५ ॥

‘आप तपस्यामें लगे रहनेके कारण थक जाते होंगे; अतः यह सदा साथ रहकर आपकी सेवा-शुश्रूषा किया करेगी, इसमें संशय नहीं है’॥ २६ ॥

ऐसी बात कहते हुए उन धर्मात्मा राजर्षिको देखकर उनकी कन्याको ग्रहण करनेकी इच्छासे उन ब्रह्मर्षिने कहा— ‘बहुत अच्छा’॥ २७ ॥

‘तब उन महर्षिको अपनी कन्या देकर राजर्षि तृणबिन्दु अपने आश्रमपर लौट आये और वह कन्या अपने गुणोंसे पतिको संतुष्ट करती हुई वहीं रहने लगी॥ २८ ॥

‘उसके शील और सदाचारसे वे महातेजस्वी मुनिवर पुलस्त्य बहुत संतुष्ट हुए और प्रसन्नतापूर्वक यों बोले— ॥ २९ ॥

‘सुन्दरि! मैं तुम्हारे गुणोंके वैभवसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। देवि! इसीलिये आज मैं तुम्हें अपने समान पुत्र प्रदान करता हूँ, जो माता और पिता दोनोंके कुलकी प्रतिष्ठा बढ़ायेगा और पौलस्त्य नामसे विख्यात होगा॥ ३० १/२ ॥ ॥

‘देवि! मैं यहाँ वेदका स्वाध्याय कर रहा था, उस समय तुमने आकर उसका विशेषरूपसे श्रवण किया, इसलिये तुम्हारा वह पुत्र विश्रवा या विश्रवण कहलायेगा; इसमें संशय नहीं है’॥ ३१ १/२ ॥

‘पतिके प्रसन्नचित्त होकर ऐसी बात कहनेपर उस देवीने बड़े हर्षके साथ थोड़े ही समयमें विश्रवा नामक पुत्रको जन्म दिया, जो यश और धर्मसे सम्पन्न होकर तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ॥ ३२-३३ ॥

‘विश्रवा मुनि वेदके विद्वान्, समदर्शी, व्रत और आचारका पालन करनेवाले तथा पिताके समान ही तपस्वी हुए’॥ ३४ ॥