भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2265

‘संध्याकी उस पुत्रीको पाकर निशाचर विद्युत्केश उसके साथ उसी तरह रमण करने लगा, जैसे देवराज इन्द्र पुलोमपुत्री शचीके साथ विहार करते हैं॥ २२ ॥

‘श्रीराम! संध्याकी उस पुत्रीका नाम सालकटङ्कटा था। कुछ कालके पश्चात् उसने विद्युत्केशसे उसी तरह गर्भ धारण किया, जैसे मेघोंकी पंक्ति समुद्रसे जल ग्रहण करती है॥ २३ ॥

तदनन्तर उस राक्षसीने मन्दराचलपर जाकर विद्युत्के समान कान्तिमान् बालकको जन्म दिया, मानो गङ्गाने अग्निके छोड़े हुए भगवान् शिवके तेजःस्वरूप गर्भ (कुमार कार्तिकेय)-को उत्पन्न किया हो। उस नवजात शिशुको वहीं छोड़कर वह विद्युत्केशके साथ रति-क्रीड़ाके लिये चली गयी॥ २४ ॥

‘अपने बेटेको भुलाकर सालकटङ्कटा पतिके साथ रमण करने लगी। उधर उसका छोड़ा हुआ वह नवजात शिशु मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द करने लगा॥

उसके शरीरकी कान्ति शरत्कालके सूर्यकी भाँति उद्भासित होती थी। माताका छोड़ा हुआ वह शिशु स्वयं ही अपनी मुट्ठी मुँहमें डालकर धीरे-धीरे रोने लगा॥ २६ ॥

‘उस समय भगवान् शंकर पार्वतीजीके साथ बैलपर चढ़कर वायुमार्ग (आकाश)-से जा रहे थे। उन्होंने उस बालकके रोनेकी आवाज सुनी॥ २७ ॥

‘सुनकर पार्वतीसहित शिवने उस रोते हुए राक्षसकुमारकी ओर देखा। उसकी दयनीय अवस्थापर दृष्टिपात करके माता पार्वतीके हृदयमें करुणाका स्रोत उमड़ उठा और उनकी प्रेरणासे त्रिपुरसूदन भगवान् शिवने उस राक्षस-बालकको उसकी माताकी अवस्थाके समान ही नौजवान बना दिया॥ २८ १/२ ॥

‘इतना ही नहीं, पार्वतीजीका प्रिय करनेकी इच्छासे अविनाशी एवं निर्विकार भगवान् महादेवने उस बालकको अमर बनाकर उसके रहनेके लिये एक आकाशचारी नगराकार विमान दे दिया॥ २९ १/२ ॥

‘राजकुमार! तत्पश्चात् पार्वतीजीने भी यह वरदान दिया कि आजसे राक्षसियाँ जल्दी ही गर्भ धारण करेंगी; फिर शीघ्र ही उसका प्रसव करेंगी और उनका पैदा किया हुआ बालक तत्काल बढ़कर माताके ही समान अवस्थाका हो जायगा॥ ३०-३१ ॥