श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2274, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताओंके इस उद्योगका समाचार सुनकर निशाचर माल्यवान्ने अपने दोनों वीर भाइयोंसे इस प्रकार कहा—॥ २३ ॥
‘सुननेमें आया है कि देवता और ऋषि मिलकर हमलोगोंका वध करना चाहते हैं। इसके लिये उन्होंने भगवान् शंकरके पास जाकर यह बात कही॥ २४ ॥
‘देव! सुकेशके पुत्र आपके वरदानके बलसे उद्दण्ड और अभिमानसे उन्मत्त हो उठे हैं। वे भयंकर राक्षस पग-पगपर हमलोगोंको सता रहे हैं॥ २५ ॥
‘प्रजानाथ! राक्षसोंसे पराजित होकर हम उन दुष्टोंके भयसे अपने घरोंमें नहीं रहने पाते हैं॥ २६ ॥
‘त्रिलोचन! आप हमारे हितके लिये उन असुरोंका वध कीजिये। दाहकोंमें श्रेष्ठ रुद्रदेव! आप अपने हुंकारसे ही राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दीजिये’॥ २७ ॥
‘देवताओंके ऐसा कहनेपर अन्धकशन्रु भगवान् शिवने अस्वीकृति सूचित करनेके लिये अपने सिर और हाथको हिलाते हुए इस प्रकार कहा—॥ २८ ॥
‘देवताओ! सुकेशके पुत्र रणभूमिमें मेरे हाथसे मारे जानेयोग्य नहीं हैं, परंतु मैं तुम्हें ऐसे पुरुषके पास जानेकी सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन सबका वध कर डालेंगे॥
‘जिनके हाथमें चक्र और गदा सुशोभित हैं, जो पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्हें जनार्दन और हरि कहते हैं तथा जो श्रीमान् नारायणके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं भगवान्की शरणमें तुम सब लोग जाओ’॥ ३० ॥
भगवान् शङ्करसे यह सलाह पाकर उन कामदाहक महादेवजीको प्रणाम करके देवता नारायणके धाममें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने उनसे सब बातें बतायीं॥ ३१ ॥
तब उन नारायणदेवने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—‘देवगण! मैं उन देवद्रोहियोंका नाश कर डालूँगा, अतः तुमलोग निर्भय हो जाओ’॥ ३२ ॥
‘राक्षसशिरोमणियो! इस प्रकार भयभीत देवताओंके समक्ष श्रीहरिने हमें मारनेकी प्रतिज्ञा की है; अतः अब इस विषयमें हमलोगोंके लिये जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करना चाहिये॥ ३३ ॥
‘हिरण्यकशिपु तथा अन्य देवद्रोही दैत्योंकी मृत्यु इन्हीं विष्णुके हाथसे हुई है। नमुचि, कालनेमि, वीरशिरोमणि संह्राद, नाना प्रकारकी माया जाननेवाला राधेय, धर्मनिष्ठ लोकपाल,