श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2293, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जब दसवाँ सहस्र पूरा हुआ और दशग्रीव अपना दसवाँ मस्तक काटनेको उद्यत हुआ, इसी समय पितामह ब्रह्माजी वहाँ आ पहुँचे॥ १२ ॥
‘पितामह ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओंके साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होंने आते ही कहा—दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ १३ ॥
‘धर्मज्ञ! तुम्हारे मनमें जिस वरको पानेकी इच्छा हो, उसे शीघ्र माँगो। बोलो, आज मैं तुम्हारी किस अभिलाषाको पूर्ण करूँ? तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं होना चाहिये’॥ १४ ॥
यह सुनकर दशग्रीवकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो गयी। उसने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और हर्ष-गद्गदवाणीमें कहा— ॥ १५ ॥
‘भगवन्! प्राणियोंके लिये मृत्युके सिवा और किसीका सदा भय नहीं रहता है; अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ; क्योंकि मृत्युके समान दूसरा कोर्इ शत्रु नहीं है’॥
‘उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने दशग्रीवसे कहा— ‘तुम्हें सर्वथा अमरत्व नहीं मिल सकता; इसलिये दूसरा कोर्इ वर माँगो’॥ १७ ॥
‘श्रीराम! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा—॥ १८ ॥
‘सनातन प्रजापते! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंके लिये अवध्य हो जाऊँ॥ १९ ॥
‘देववन्द्य पितामह! अन्य प्राणियोंसे मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। मनुष्य आदि अन्य जीवोंको तो मैं तिनकेके समान समझता हूँ’॥ २० ॥
राक्षस दशग्रीवके ऐसा कहनेपर देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माजीने कहा—॥ २१ ॥
राक्षसप्रवर! तुम्हारा यह वचन सत्य होगा।’ श्रीराम! दशग्रीवसे ऐसा कहकर पितामह फिर बोले—॥ २२ ॥
‘निष्पाप राक्षस! सुनो—मैं प्रसन्न होकर पुनः तुम्हें यह शुभ वर प्रदान करता हूँ—तुमने पहले अग्निमें अपने जिन-जिन मस्तकोंका हवन किया है, वे सब तुम्हारे लिये फिर पूर्ववत् प्रकट हो जायँगे। सौम्य! इसके सिवा एक और भी दुर्लभ वर मैं तुम्हें यहाँ दे रहा हूँ—तुम अपने मनसे जब जैसा रूप धारण करना चाहोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार उस समय तुम्हारा वैसा ही रूप हो जायगा’॥ २३-२४ १/२ ॥