भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2295

‘पहले वर न पानेपर भी इस राक्षसने जब इस प्रकार प्राणियोंके भक्षणका क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, तब यदि इसे वर प्राप्त हो जाय, उस दशामें तो यह तीनों लोकोंको खा जायगा॥ ३८ १/२ ॥

‘अमिततेजस्वी देव! आप वरके बहाने इसको मोह प्रदान कीजिये। इससे समस्त लोकोंका कल्याण होगा और इसका भी सम्मान हो जायगा’॥ ३९ १/२ ॥

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर कमलयोनि ब्रह्माजीने सरस्वतीका स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही देवी सरस्वती पास आ गयीं॥ ४० १/२ ॥

उनके पार्श्वभागमें खड़ी हो सरस्वतीने हाथ जोड़कर कहा— ‘देव! यह मैं आ गयी। मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं कौन-सा कार्य करूँ?’॥ ४१ १/२ ॥

‘तब प्रजापतिने वहाँ आयी हुई सरस्वतीदेवीसे कहा— ‘वाणि! तुम राक्षसराज कुम्भकर्णकी जिह्वापर विराजमान हो देवताओंके अनुकूल वाणीके रूपमें प्रकट होओ’॥ ४२ १/२ ॥

‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सरस्वती कुम्भकर्णके मुखमें समा गयीं। इसके बाद प्रजापतिने उस राक्षससे कहा— ‘महाबाहु कुम्भकर्ण! तुम भी अपने मनके अनुकूल कोई वर माँगो’॥ ४३ १/२ ॥

‘उनकी बात सुनकर कुम्भकर्ण बोला— ‘देवदेव! मैं अनेकानेक वर्षोंतक सोता रहूँ। यही मेरी इच्छा है।’ तब ‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’ कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ चले गये॥ ४४-४५ ॥

‘फिर सरस्वतीदेवीने भी उस राक्षसको छोड़ दिया। ब्रह्माजीके साथ देवताओंके आकाशमें चले जानेपर जब सरस्वतीजी उसके ऊपरसे उतर गयीं, तब दुष्टात्मा कुम्भकर्णको चेत हुआ और वह दुःखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा॥ ४६-४७ ॥

‘अहो! आज मेरे मुँहसे ऐसी बात क्यों निकल गयी। मैं समझता हूँ, ब्रह्माजीके साथ आये हुए देवताओंने ही उस समय मुझे मोहमें डाल दिया था’॥ ४८ ॥

‘इस प्रकार वे तीनों तेजस्वी भ्राता वर पाकर श्लेष्मातकवन (लसोड़ेके जंगल)-में गये और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे॥ ४९ ॥