श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘भद्रे! मैं लङ्काका राजा हूँ। मेरा नाम दशग्रीव है। तुम मेरी भार्या हो जाओ और सुखपूर्वक उत्तम भोग भोगो॥ २३ ॥
‘पहले यह तो बताओ, तुम जिसे विष्णु कहती है, वह कौन है? अङ्गे! भद्रे! तुम जिसे चाहती हो, वह बल, पराक्रम, तप और भोग-वैभवके द्वारा मेरी समानता नहीं कर सकता’॥ २४ १/२ ॥
उसके ऐसा कहनेपर कुमारी वेदवती उस निशाचरसे बोली—‘नहीं, नहीं, ऐसा न कहो॥ २५ १/२ ॥
‘राक्षसराज! भगवान् विष्णु तीनों लोकोंके अधिपति हैं। सारा संसार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान् होकर भी उनकी अवहेलना करेगा’॥ २६ १/२ ॥
वेदवतीके ऐसा कहनेपर उस राक्षसने अपने हाथसे उस कन्याके केश पकड़ लिये॥ २७ १/२ ॥
इससे वेदवतीको बड़ा क्रोध हुआ। उसने अपने हाथसे उन केशोंको काट दिया। उसके हाथने तलवार बनकर तत्काल उसके केशोंको मस्तकसे अलग कर दिया॥ २८ १/२ ॥
वेदवती रोषसे प्रज्वलित-सी हो उठी। वह जल मरनेके लिये उतावली हो अग्निकी स्थापना करके उस निशाचरको दग्ध करती हुई-सी बोली—॥ २९ १/२ ॥
‘नीच राक्षस! तूने मेरा तिरस्कार किया है; अतः अब इस जीवनको सुरक्षित रखना मुझे अभीष्ट नहीं है। इसलिये तेरे देखते-देखते मैं अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी॥ ३० १/२ ॥
‘तुझ पापात्माने इस वनमें मेरा अपमान किया है। इसलिये मैं तेरे वधके लिये फिर उत्पन्न होऊँगी॥ ३१ १/२ ॥
‘स्त्री अपनी शारीरिक शक्तिसे किसी पापाचारी पुरुषका वध नहीं कर सकती। यदि मैं तुझे शाप दूँ तो मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी॥ ३२ १/२ ॥
‘यदि मैंने कुछ भी सत्कर्म, दान और होम किये हों तो अगले जन्ममें मैं सती-साध्वी अयोनिजा कन्याके रूपमें प्रकट होऊँ तथा किसी धर्मात्मा पिताकी पुत्री बनूँ’॥