भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2331, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2331

रणक्षेत्रमें जा पहुँची॥ १२ १/२ ॥

युद्धविशारद रघुवीर! फिर तो राजा अनरण्य और निशाचर रावणमें बड़ा अद्भुत संग्राम होने लगा॥ १३ १/२ ॥

उस समय राजाकी सारी सेना रावणकी सेनाके साथ टक्कर लेकर उसी तरह नष्ट होने लगी, जैसे अग्निमें दी हुई आहुति पूर्णतः भस्म हो जाती है॥ १४ १/२ ॥

उस सेनाने बहुत देरतक युद्ध किया, बड़ा पराक्रम दिखाया; परंतु तेजस्वी रावणका सामना करके वह बहुत थोड़ी संख्यामें शेष रह गयी और अन्ततोगत्वा जैसे पतिङ्गे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार कालके गालमें चली गयी॥ १५-१६ ॥

राजाने देखा, मेरी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती चली जा रही है, जैसे जलसे भरी हुई सैकड़ों नदियाँ महासागरके पास पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं॥ १७ ॥

तब महाराज अनरण्य क्रोधसे मूर्छित हो अपने इन्द्रधनुषके समान महान् शरासनको टंकारते हुए रावणका सामना करनेके लिये आये॥ १८ ॥

फिर तो जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार मारीच, शुक, सारण तथा प्रहस्त—ये चारों राक्षस मन्त्री राजा अनरण्यसे परास्त होकर भाग खड़े हुए॥

तत्पश्चात् इक्ष्वाकुवंशको आनन्दित करनेवाले राजा अनरण्यने राक्षसराज रावणके मस्तकपर आठ सौ बाण मारे॥ २० ॥

परंतु जैसे बादलोंसे पर्वतशिखरपर गिरती हुई जलधाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचरके शरीरपर कहीं घाव न कर सके॥ २१ ॥

इसके बाद राक्षसराजने कुपित होकर राजाके मस्तकपर एक तमाचा मारा। इससे आहत होकर राजा रथसे नीचे गिर पड़े॥ २२ ॥

जैसे वनमें वज्रपातसे दग्ध हुआ साखूका वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमिपर गिरे और थर-थर काँपने लगे॥ २३ ॥

यह देख रावण जोर-जोरसे हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकुवंशी नरेशसे बोला—'इस समय मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या फल प्राप्त किया है?'॥ २४ ॥

'नरेश्वर! तीनों लोकोंमें कोई ऐसा वीर नहीं है, जो मुझे द्वन्द्वयुद्ध दे सके। जान पड़ता है तुमने भोगोंमें अधिक आसक्त रहनेके कारण मेरे बल-पराक्रमको नहीं सुना था'॥ २५ ॥