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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 2335, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 2335

यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारदने कहा— 'शत्रुसूदन! यदि तुम रसातलको जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्तेसे कहाँ जा रहे हो? दुर्धर्ष वीर! रसातलका यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है और यमराजकी पुरीसे होकर ही जाता है'॥

नारदजीके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण शरद्-ऋतुके बादलकी भाँति अपना उज्ज्वल हास बिखेरता हुआ बोला— 'देवर्षे! मैंने आपकी बात स्वीकार कर ली।' इसके बाद उसने यों कहा —॥ २२ १/२ ॥

'ब्रह्मन्! अब यमराजका वध करनेके लिये उद्यत होकर मैं उस दक्षिण दिशाको जाता हूँ, जहाँ सूर्यपुत्र राजा यम निवास करते हैं॥ २३ १/२ ॥

'प्रभो! भगवन्! मैंने युद्धकी इच्छासे क्रोधपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालोंको परास्त करूँगा॥

'अतः मैं यहाँसे यमपुरीको प्रस्थान कर रहा हूँ। संसारके प्राणियोंको मौतका कष्ट देनेवाले सूर्यपुत्र यमको स्वयं ही मृत्युसे संयुक्त कर दूँगा'॥ २५ १/२ ॥

ऐसा कहकर दशग्रीवने मुनिको प्रणाम किया और मन्त्रियोंके साथ वह दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया॥

उसके चले जानेपर धूमरहित अग्निके समान महातेजस्वी विप्रवर नारदजी दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो इस प्रकार विचार करने लगे—॥ २७ १/२ ॥

'आयु क्षीण होनेपर जिनके द्वारा धर्मपूर्वक इन्द्रसहित तीनों लोकोंके चराचर प्राणी क्लेशमें डाले जाते—दण्डित होते हैं, वे कालस्वरूप यमराज इस रावणके द्वारा कैसे जीते जायेंगे?॥ २८ १/२ ॥

'जो जीवोंके दान और कर्मके साक्षी हैं, जिनका तेज द्वितीय अग्निके समान है, जिन महात्मासे चेतना पाकर सम्पूर्ण जीव नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, जिनके भयसे पीड़ित हो तीनों लोकोंके प्राणी उनसे दूर भागते हैं, उन्हींके पास यह राक्षसराज स्वयं ही कैसे जायगा?॥ २९-३० १/२ ॥

'जो त्रिलोकीको धारण-पोषण करनेवाले तथा पुण्य और पापके फल देनेवाले हैं और जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय पायी है, उन्हीं कालदेवको यह राक्षस कैसे जीतेगा? काल ही

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