श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘देवेन्द्र! उस यज्ञसे पवित्र होकर तुम पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। तुम्हारा पुत्र जयन्त उस महासमरमें मारा नहीं गया है। उसका नाना पुलोमा उसे महासागरमें ले गया है। इस समय वह उसीके पास है’॥
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवराज इन्द्रने वैष्णवयज्ञका अनुष्ठान किया। वह यज्ञ पूरा करके देवराज स्वर्गलोकमें गये और वहाँ देवराज्यका शासन करने लगे॥ ४९ १/२ ॥
रघुनन्दन! यह है इन्द्रविजयी मेघनादका बल, जिसका मैंने आपसे वर्णन किया है। उसने देवराज इन्द्रको भी जीत लिया था; फिर दूसरे प्राणियोंकी तो बिसात ही क्या थी॥ ५० १/२ ॥
अगस्त्यजीकी यह बात सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण तत्काल बोल उठे—‘आश्चर्य है।’ साथ ही वानरों और राक्षसोंको भी इस बातसे बड़ा विस्मय हुआ॥ ५१ १/२ ॥
उस समय श्रीरामके बगलमें बैठे हुए विभीषणने कहा—‘मैंने पूर्वकालमें जो आश्चर्यकी बातें देखी थीं, उनका आज महर्षिने स्मरण दिला दिया है’॥ ५२ १/२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्यजीसे कहा—‘आपकी बात सत्य है। मैंने भी विभीषणके मुखसे यह बात सुनी थी।’ फिर अगस्त्यजी बोले—‘श्रीराम! इस प्रकार पुत्रसहित रावण सम्पूर्ण जगत्के लिये कण्टकरूप था, जिसने देवराज इन्द्रको भी संग्राममें जीत लिया था’॥ ५३-५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३० ॥