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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2411

‘इस बालकके द्वारा भविष्यमें आपलोगोंके बहुत-से कार्य सिद्ध होंगे, अतः वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये आप सब लोग इसे वर दें’ ॥ ९ ॥

तब सुन्दर मुखवाले सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने शिशु हनुमान्के गलेमें बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलोंकी माला पहना दी और यह बात कही—॥ १० ॥

‘मेरे हाथसे छूटे हुए वज्रके द्वारा इस बालककी हनु (ठुड्डी) टूट गयी थी; इसलिये इस कपिश्रेष्ठका नाम ‘हनुमान्’ होगा॥ ११ ॥

‘इसके सिवा मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आजसे यह मेरे वज्रके द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा’ ॥ १२ ॥

इसके बाद वहाँ अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यने कहा—‘मैं इसे अपने तेजका सौवाँ भाग देता हूँ॥ १३ ॥

१. तीन युग्मोंका तात्पर्य यहाँ छः प्रकारके ऐश्वर्यसे है। ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य—ये ही छः प्रकारके ऐश्वर्य हैं। २. ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये ही तीन मूर्तियाँ हैं। ३. बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—ये ही देवताओंकी तीन अवस्थाएँ हैं।

‘इसके सिवा जब इसमें शास्त्राध्ययन करनेकी शक्ति आ जायगी, तब मैं ही इसे शास्त्रोंका ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा। शास्त्रज्ञानमें कोई भी इसकी समानता करनेवाला न होगा’ ॥ १४ ॥

तत्पश्चात् वरुणने वर देते हुए कहा—‘दस लाख वर्षोंकी आयु हो जानेपर भी मेरे पाश और जलसे इस बालककी मृत्यु नहीं होगी’ ॥ १५ ॥

फिर यमने वर दिया—‘यह मेरे दण्डसे अवध्य और नीरोग होगा।’ तदनन्तर पिंगलवर्णकी एक आँखवाले कुबेरने कहा—‘मैं संतुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्धमें कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राममें इसका वध न कर सकेगी’ ॥ १६-१७ ॥

इसके बाद भगवान् शङ्करने यह उत्तम वर दिया कि ‘यह मेरे और मेरे आयुधोंके द्वारा भी अवध्य होगा’ ॥

शिल्पियोंमें श्रेष्ठ परम बुद्धिमान् विश्वकर्माने बालसूर्यके समान अरुण कान्तिवाले उस शिशुको देखकर उसे इस प्रकार वर दिया—॥ १९ ॥