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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 243

बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र? इन दो वरोंमेंसे किस वरको कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है?'॥ ११-१२ ॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने राजा सगरके समीप वंश चलानेवाले एक ही पुत्रका वर ग्रहण किया॥ १३ ॥

‘तब गरुड़की बहिन सुमतिने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रोंको जन्म देनेका वर प्राप्त किया॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर रानियोंसहित राजा सगरने महर्षिकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपने नगरको प्रस्थान किया॥ १५ ॥

‘कुछ काल व्यतीत होनेपर बड़ी रानी केशिनीने सगरके औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया॥ १६ ॥

‘पुरुषसिंह! (छोटी रानी) सुमतिने तूंबीके आकारका एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया। उसको फोड़नेसे साठ हजार बालक निकले॥ १७ ॥

‘उन्हें घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं। धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्थाको प्राप्त हुए॥

‘इस तरह दीर्घकालके पश्चात् राजा सगरके रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये॥ १९ ॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! सगरका ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगरके बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता॥ २० १/२ ॥

‘इस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषोंको पीड़ा देने और नगर-निवासियोंका अहित करने लगा, तब पिताने उसे नगरसे बाहर निकाल दिया॥ २१ १/२ ॥

‘असमञ्जके पुत्रका नाम था अंशुमान्। वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगोंको प्रिय था॥ २२ १/२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! कुछ कालके अनन्तर महाराज सगरके मनमें यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’॥ २३ १/२ ॥

‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपाध्यायोंके साथ यज्ञ करनेकी तैयारीमें लग गये’॥ २४ ॥

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