श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2443, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंछियालीसवाँ सर्ग
लक्ष्मणका सीताको रथपर बिठाकर उन्हें वनमें छोड़नेके लिये ले जाना और गङ्गाजीके तटपर पहुँचना
तब सुमन्त्र ‘बहुत अच्छा’ कहकर तुरंत ही उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ एक सुन्दर रथ ले आये, जिसपर तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब लक्ष्मणने मन-ही-मन दुःखी हो सूखे मुखसे सुमन्त्रसे कहा— ॥ १ ॥
बिछा दो। मैं महाराजकी आज्ञासे सीतादेवीको पुण्यकर्मा महर्षियोंके आश्रमपर पहुँचा दूँगा। तुम शीघ्र रथ ले आओ’॥ २-३ ॥
‘सारथे! एक उत्तम रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतो और उस रथमें सीताजीके लिये सुन्दर आसन
सुखद शय्यासे युक्त सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था॥ ४ ॥
उसे लाकर वे मित्रोंका मान बढ़ानेवाले सुमित्रा-कुमारसे बोले— ‘प्रभो! यह रथ आ गया। अब जो कुछ करना हो कीजिये’॥ ५ ॥
सुमन्त्रके ऐसा कहनेपर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण राजमहलमें गये और सीताजीके पास जाकर बोले— ॥ ६ ॥
‘देवि! आपने महाराजसे मुनियोंके आश्रमोंपर जानेके लिये वर माँगा था और महाराजने आपको आश्रमपर पहुँचानेके लिये प्रतिज्ञा की थी॥ ७ ॥
‘देवि! विदेहनन्दिनि! उस बातचीतके अनुसार मैं राजाकी आज्ञासे शीघ्र ही गङ्गातटपर ऋषियोंके सुन्दर आश्रमोंतक चलूँगा और आपको मुनिजनसेवित वनमें पहुँचाऊँगा’॥ ८½ ॥
महात्मा लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी सीताको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे चलनेको तैयार हो गयीं॥ ९½ ॥
बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न लेकर वैदेही सीता वनकी यात्राके लिये उद्यत हो गयीं और लक्ष्मणसे बोलीं— ‘ये सब बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न-धन मैं मुनि-पत्नियोंको दूँगी’॥ १०-११½ ॥