श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2450, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ें‘लक्ष्मण! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्म-पालनके लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना॥ ११ ॥
‘रघुनन्दन। वास्तवमें तो आप जानते ही हैं कि सीता शुद्धचरित्रा है। सर्वदा ही आपके हितमें तत्पर रहती है और आपके प्रति परम प्रेमभक्ति रखनेवाली है॥ १२ ॥
‘वीर! आपने अपयशसे डरकर ही मुझे त्यागा है; अतः लोगोंमें आपकी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अपवाद फैल रहा है, उसे दूर करना मेरा भी कर्तव्य है; क्योंकि मेरे परम आश्रय आप ही हैं॥ १३½ ॥
‘लक्ष्मण! तुम महाराजसे कहना कि आप धर्मपूर्वक बड़ी सावधानीसे रहकर पुरवासियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करें, जैसा अपने भाइयोंके साथ करते हैं। यही आपका परम धर्म है और इसीसे आपको परम उत्तम यशकी प्राप्ति हो सकती है॥ १४-१५ ॥
‘राजन्! पुरवासियोंके प्रति धर्मानुकूल आचरण करनेसे जो पुण्य प्राप्त होगा, वही आपके लिये उत्तम धर्म और कीर्ति है। पुरुषोत्तम! मुझे अपने शरीरके लिये कुछ भी चिन्ता नहीं है॥ १६ ॥
‘रघुनन्दन! जिस तरह पुरवासियोंके अपवादसे बचकर रहा जा सके, उसी तरह आप रहें। स्त्रीके लिये तो पति ही देवता है, पति ही बन्धु है, पति ही गुरु है। इसलिये उसे प्राणोंकी बाजी लगाकर भी विशेषरूपसे पतिका प्रिय करना चाहिये॥ १७½ ॥
‘मेरी ओरसे सारी बातें तुम श्रीरघुनाथजीसे कहना और आज तुम भी मुझे देख जाओ। मैं इस समय ऋतुकालका उल्लङ्घन करके गर्भवती हो चुकी हूँ’॥ १८½ ॥
सीताके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मणका मन बहुत दुःखी हो गया। उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया। उस समय उनके मुखसे कोई भी बात नहीं निकल सकी॥ १९½ ॥
उन्होंने जोर-जोरसे रोते हुए ही सीता माताकी परिक्रमा की और दो घड़ीतक सोच-विचारकर उनसे कहा—‘शोभने! आप यह मुझसे क्या कह रही हैं?॥
‘निष्पाप पतिव्रते! मैंने पहले भी आपका सम्पूर्ण रूप कभी नहीं देखा है। केवल आपके चरणोंके ही दर्शन किये हैं। फिर आज यहाँ वनके भीतर श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें मैं आपकी ओर कैसे देख सकता हूँ’॥ २१½ ॥