श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 2452, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनचासवाँ सर्ग
मुनिकुमारोंसे समाचार पाकर वाल्मीकिका सीताके पास आ उन्हें सान्त्वना देना और आश्रममें लिवा ले जाना
जहाँ सीता रो रही थीं, वहाँसे थोड़ी ही दूरपर ऋषियोंके कुछ बालक थे। वे उन्हें रोते देख अपने आश्रमकी ओर दौड़े, जहाँ उग्र तपस्यामें मन लगानेवाले भगवान् वाल्मीकि मुनि विराजमान थे॥ १ ॥
उन सब मुनिकुमारोंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन करके उनसे सीताजीके रोनेका समाचार सुनाया॥ २ ॥
वे बोले—‘भगवन्! गङ्गातटपर किन्हीं महात्मा नरेशकी पत्नी हैं, जो साक्षात् लक्ष्मीके समान जान पड़ती हैं। इन्हें हमलोगोंने पहले कभी नहीं देखा था। वे मोहके कारण विकृतमुख होकर रो रही हैं॥ ३ ॥
‘भगवन्! आप स्वयं चलकर अच्छी तरह देख लें। वे आकाशसे उतरी हुई किसी देवी-सी दिखायी देती हैं। प्रभो! गङ्गाजीके तटपर जो वे कोई श्रेष्ठ सुन्दरी स्त्री बैठी हैं, बहुत दुःखी हैं॥ ४ ॥
‘हमने अपनी आँखों देखा है, वे बड़े जोर-जोरसे रोती हैं और गहरे शोकमें डूबी हुई हैं। वे दुःख और शोक भोगनेके योग्य नहीं हैं। अकेली हैं, दीन हैं और अनाथकी तरह बिलख रही हैं॥ ५ ॥
‘हमारी समझमें ये मानवी स्त्री नहीं हैं। आपको इनका सत्कार करना चाहिये। इस आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर होनेके कारण ये वास्तवमें आपकी शरणमें आयी हैं॥ ६ ॥
‘भगवन्! ये साध्वी देवी अपने लिये कोई रक्षक ढूँढ़ रही हैं। अतः आप इनकी रक्षा करें।’ उन मुनिकुमारोंकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ महर्षिने बुद्धिसे निश्चित करके असली बातको जान लिया; क्योंकि उन्हें तपस्याद्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त थी। जानकर वे उस स्थानपर दौड़े हुए आये, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता विराजमान थीं॥ ७½ ॥
उन परम बुद्धिमान् महर्षिको जाते देख उनके शिष्य भी उनके साथ हो लिये। कुछ पैदल चलकर वे महामति महर्षि सुन्दर अर्घ्य लिये गङ्गातटवर्ती उस स्थानपर आये। वहाँ आकर उन्होंने