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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2458

उनके आश्रमपर निर्भय होकर रहने लगे॥ ११-१२ ॥

‘भृगुपत्नीने दैत्योंको आश्रय दिया है, यह देखकर कुपित हुए देवेश्वर भगवान् विष्णुने तीखी धारवाले चक्रसे उनका सिर काट लिया॥ १३ ॥

‘अपनी पत्नीका वध हुआ देख भार्गववंशके प्रवर्तक भृगुजीने सहसा कुपित हो शत्रुकुलनाशन भगवान् विष्णुको शाप दिया॥ १४ ॥

‘जनार्दन! मेरी पत्नी वधके योग्य नहीं थी। परंतु आपने क्रोधसे मूर्च्छित होकर उसका वध किया है, इसलिये आपको मनुष्यलोकमें जन्म लेना पड़ेगा और वहाँ बहुत वर्षोंतक आपको पत्नी-वियोगका कष्ट सहना पड़ेगा'॥ १५ १/२ ॥

‘परंतु इस प्रकार शाप देकर उनके चित्तमें बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उनकी अन्तरात्माने भगवान्‌से उस शापको स्वीकार करानेके लिये उन्हींकी आराधना करनेको प्रेरित किया। इस तरह शापकी विफलताके भयसे पीड़ित हुए भृगुने तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना की॥ १६ १/२ ॥

‘तपस्याद्वारा उनके आराधना करनेपर भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर कहा—‘महर्षे! सम्पूर्ण जगत्का प्रिय करनेके लिये मैं उस शापको ग्रहण कर लूँगा'॥

‘इस तरह पूर्वजन्ममें (विष्णु-नामधारी वामन अवतारके समय) महातेजस्वी भगवान् विष्णुको भृगु ऋषिका शाप प्राप्त हुआ था। दूसरोंको मान देनेवाले नृपश्रेष्ठ! वे ही इस भूतलपर आकर तीनों लोकोंमें राम-नामसे विख्यात आपके पुत्र हुए हैं॥ १८-१९ ॥

‘भृगुके शापसे होनेवाला पत्नी-वियोगरूप जो महान् फल है, वह उन्हें अवश्य प्राप्त होगा। श्रीराम दीर्घकालतक अयोध्याके राजा होकर रहेंगे॥ २० ॥

‘उनके अनुयायी भी बहुत सुखी और धनधान्यसे सम्पन्न होंगे। श्रीराम ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करके अन्तमें ब्रह्मलोक (वैकुण्ठ या साकेतधाम)-को पधारेंगे॥ २१ १/२ ॥

‘परम दुर्जय वीर श्रीराम समृद्धिशाली अश्वमेधयज्ञों का बारम्बार अनुष्ठान करके बहुत-से राजवंशोंकी स्थापना करेंगे। श्रीरघुनाथजीको सीताके गर्भसे दो पुत्र प्राप्त होंगे'॥ २२-२३ ॥

‘ये सब बातें कहकर उन महातेजस्वी महामुनिने राजवंशके विषयमें भूत और भविष्यकी सारी बातें बतायीं। इसके बाद वे चुप हो गये॥ २४ ॥