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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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चौवनवाँ सर्ग

राजा नृगका एक सुन्दर गढ्ढा बनवाकर अपने पुत्रको राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना

श्रीरामका यह भाषण सुनकर परमार्थवेत्ता लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजीसे बोले—॥ १ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण! उन दोनों ब्राह्मणोंने थोड़े-से ही अपराधपर राजर्षि नृगको द्वितीय यमदण्डके समान ऐसा महान् शाप दे दिया॥ २ ॥

‘पुरुषप्रवर! अपनेको शापरूपी पापसे संयुक्त हुआ सुनकर राजा नृगने उन क्रोधी ब्राह्मणोंसे क्या कहा?’॥ ३ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले—‘सौम्य! पूर्वकालमें शापग्रस्त होकर राजा नृगने जो कुछ कहा, उसे बताता हूँ, सुनो॥ ४ ॥

‘जब राजा नृगको यह पता लगा कि वे दोनों ब्राह्मण चले गये और कहीं रास्तेमें होंगे, तब उन्होंने मन्त्रियोंको, समस्त पुरवासियोंको, पुरोहितोंको तथा समस्त प्रकृतियोंको भी बुलाकर दुःखसे पीड़ित होकर कहा—‘आपलोग सावधान होकर मेरी बात सुनें—॥ ५-६ ॥

‘नारद और पर्वत—ये दोनों कल्याणकारी और अनिन्द्य देवर्षि मेरे पास आये थे। वे दोनों ब्राह्मणोंके दिये हुए शापकी बात बताकर मुझे महान् भय दे वायुके समान तीव्र गतिसे ब्रह्मलोकको चले गये॥ ७ ॥

‘ये जो वसु नामक राजकुमार हैं, इन्हें इस राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय और कारीगर मेरे लिये एक ऐसा गढ्ढा तैयार करें, जिसका स्पर्श सुखद हो॥ ८ ॥

‘ब्राह्मणके मुखसे निकले हुए उस शापको वहीं रहकर मैं बिताऊँगा। एक गढ्ढा ऐसा होना चाहिये, जो वर्षाके कष्टका निवारण करनेवाला हो। दूसरा सर्दीसे बचानेवाला हो और शिल्पीलोग तीसरा एक ऐसा गढ्ढा तैयार करें जो गर्मीका निवारण करे और जिसका स्पर्श सुखदायक हो॥ ९ १/२ ॥

‘जो फल देनेवाले वृक्ष हैं और फूल देनेवाली लताएँ हैं, उन्हें उन गड्डोंमें लगाया जाय। घनी छायावाले अनेक प्रकारके वृक्षोंका वहाँ आरोपण किया जाय। उन गड्डोंके चारों ओर डेढ़-