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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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बासठवाँ सर्ग

श्रीरामका ऋषियोंसे लवणासुरके आहार-विहारके विषयमें पूछना और शत्रुघ्नकी रुचि जानकर उन्हें लवण-वधके कार्यमें नियुक्त करना

ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हाथ जोड़कर पूछा—‘लवणासुर क्या खाता है? उसका आचार-व्यवहार कैसा है—रहने-सहनेका ढंग क्या है? और वह कहाँ रहता है?’॥ १ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर उन सभी ऋषियोंने जिस तरहके आहार-व्यवहारसे लवणासुर पला था, वह सब कह सुनाया॥ २ ॥

वे बोले— ‘प्रभो! उसका आहार तो सभी प्राणी हैं; परंतु विशेषतः वह तपस्वी मुनियोंको खाता है। उसके आचार-व्यवहारमें बड़ी क्रूरता और भयानकता है और वह सदा मधुवनमें निवास करता है॥ ३ ॥

‘वह प्रतिदिन कँइ सहस्र सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्योंको मारकर खा जाता है॥ ४ ॥

‘संहारकाल आनेपर मुँह बाकर खड़े हुए यमराजके समान वह महाबली असुर दूसरे-दूसरे जीवोंको भी खाता रहता है’॥ ५ ॥

उनका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने उन महामुनियोंसे कहा—‘महर्षियो! मैं उस राक्षसको मरवा डालूँगा। आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये’॥ ६ ॥

इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी मुनियोंके समक्ष प्रतिज्ञा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने वहाँ एकत्र हुए अपने सब भाइयोंसे पूछा—॥ ७ ॥

‘बन्धुओ! लवणको कौन वीर मारेगा? उसे किसके हिस्सेमें रखा जाय—महाबाहु भरतके या बुद्धिमान् शत्रुघ्नके’॥

रघुनाथजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतजी बोले— ‘भैया! मैं इस लवणका वध करूँगा। इसे मेरे हिस्सेमें रखा जाय’॥ ९ ॥

भरतजीके ये धीरता और वीरतापूर्ण शब्द सुनकर शत्रुघ्नजी सोनेका सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और महाराज श्रीरामको प्रणाम करके बोले—‘रघुनन्दन! महाबाहु मझले भैया तो बहुत-