भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तिरसठवाँ सर्ग

श्रीरामद्वारा शत्रुघ्नका राज्याभिषेक तथा उन्हें लवणासुरके शूलसे बचनेके उपायका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बल-विक्रमसे सम्पन्न शत्रुघ्न बड़े लज्जित हुए और धीरे-धीरे बोले—॥ १ ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण नरेश्वर! इस अभिषेकको स्वीकार करनेमें तो मुझे अधर्म जान पड़ता है। भला, बड़े भाइयोंके रहते हुए छोटेका अभिषेक कैसे किया जा सकता है?॥ २ ॥

‘तथापि पुरुषप्रवर! महाभाग! आपकी आज्ञाका पालन तो मुझे अवश्य करना ही चाहिये। आपका शासन किसीके लिये भी दुर्लङ्घ्य है॥ ३ ॥

‘वीर! मैंने आपसे तथा वेदवाक्योंसे भी यह बात सुनी है। वास्तवमें मझले भैयाके प्रतिज्ञा कर लेनेपर मुझे कुछ नहीं बोलना चाहिये था॥ ४ ॥

‘मेरे मुँहसे ये बड़े ही अनुचित शब्द निकल गये कि मैं लवणको मारूँगा। पुरुषोत्तम! उस अनुचित कथनका ही परिणाम है कि मेरी इस प्रकार दुर्गति हो रही है (मुझे बड़ोंके होते हुए अभिषिक्त होना पड़ता है)॥ ५ ॥

‘बड़े भांऽइके बोलनेपर मुझे फिर कुछ उत्तर नहीं देना चाहिये था; (अर्थात् भैया भरतने जब लवणको मारनेका निर्णय कर लिया, तब मुझे उसमें दखल नहीं देना चाहिये था) परंतु मैंने इस नियमका उल्लङ्घन किया, इसीलिये आपने ऐसा (राज्याभिषेकविषयक) आदेश दे दिया। जो स्वीकार कर लेनेपर मेरे लिये अधर्मयुक्त होनेके कारण परलोकके लाभसे भी वञ्चित करनेवाला है। तथापि आपकी आज्ञा मेरे लिये दुर्लङ्घ्य है; अतः मुझे इसको स्वीकार करना ही पड़ेगा॥ ६ ॥

‘काकुत्स्थ! अब आपकी जो आज्ञा हो चुकी, उसके विरुद्ध मैं दूसरा कोंऽइ उत्तर नहीं दूँगा। मानद! कहीं ऐसा न हो कि दूसरा कोंऽइ उत्तर देनेपर मुझे इससे भी कठोर दण्ड भोगना पड़े॥ ७ ॥

‘राजन्! पुरुषप्रवर रघुनन्दन! मैं आपकी इच्छाके अनुसार ही कार्य करूँगा। किंतु इसमें मेरे लिये जो अधर्म प्राप्त होता हो, उसका नाश आप करें’॥ ८ ॥